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Rigveda / 9 / 97 / 22

तक्ष॒द्यदी॒ मन॑सो॒ वेन॑तो॒ वाग्ज्येष्ठ॑स्य वा॒ धर्म॑णि॒ क्षोरनी॑के । आदी॑माय॒न्वर॒मा वा॑वशा॒ना जुष्टं॒ पतिं॑ क॒लशे॒ गाव॒ इन्दु॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 97 | Mantra No : 22

In Hindi:

ऋषि : कर्णश्रुद्वासिष्ठः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : तक्ष॑त् । यदि॑ । मन॑सः । वेन॑तः । वाक् । ज्येष्ठ॑स्य । वा॒ । धर्म॑णि । क्षोः । अनी॑के । आत् । ई॒म् । आ॒य॒न् । वर॑म् । आ । वा॒व॒शा॒नाः । जुष्ट॑म् । पति॑म् । क॒लशे॑ । गावः॑ । इन्दु॑म् ॥ ९.९७.२२

पदार्थ : (क्षोरनीके, धर्मणि) वैदिक धर्म में (वेनतो मनसः) अत्यन्त कान्तिवाले मन की (वाक्) वाणी (तक्षत्) आत्मा का संस्कार करती है (यदि वा) अथवा (गावः) इन्द्रियें (इन्दुम्) प्रकाशस्वरूप परमात्मा का, जो (पतिम्) लोक-लोकान्तरों का पति है (वरम्) वरणीय है (जुष्टम्) जो सबका प्रेमपूर्वक उपासनीय है (कलशे) अन्तःकरण में (ईम्) उक्त परमात्मा को (आयन्) आते हुए (वावशानाः) ग्रहण करके (आत्) तदनन्तर तुरन्त ही साक्षात्कार करती है ॥२२॥

भावार्थ : जो लोग कर्मयज्ञ तथा ज्ञानयज्ञ द्वारा मन का संस्कार करते हैं, उनका शुद्ध मन परमात्मा के ज्ञान का लाभ करता है ॥२२॥