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Rigveda / 9 / 97 / 56

ए॒ष वि॑श्व॒वित्प॑वते मनी॒षी सोमो॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॑ । द्र॒प्साँ ई॒रय॑न्वि॒दथे॒ष्विन्दु॒र्वि वार॒मव्यं॑ स॒मयाति॑ याति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 97 | Mantra No : 56

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒षः । वि॒श्व॒ऽवित् । प॒व॒ते॒ । म॒नी॒षी । सोमः॑ । विश्व॑स्य । भुव॑नस्य । राजा॑ । द्र॒प्सान् । ई॒रय॑न् । वि॒दथे॑षु । इन्दुः॑ । वि । वार॑म् । अव्य॑म् । स॒मया॑ । अति॑ । या॒ति॒ ॥ ९.९७.५६

पदार्थ : (एषः) उक्त परमात्मा (विश्ववित्) सर्वज्ञ है, (पवते) सबको पवित्र करनेवाला है, (मनीषी) सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियों का प्रेरक है, (सोमः) वह सर्वोत्पादक परमात्मा (विश्वस्य) सम्पूर्ण (भुवनस्य) लोकों का (राजा) प्रकाशक है, (इन्दुः) वह प्रकाशस्वरूप परमात्मा (विदथेषु) ज्ञानयज्ञों में (द्रप्सान्) ज्ञानों की (ईरयन्) प्रेरणा करता हुआ (अव्यम्) रक्षायोग्य (वारम्) वरणीय पुरुष को (समयाति, याति) अतिसंनिहित प्राप्त होता है ॥५६॥

भावार्थ : जो परमात्मज्ञान के अधिकारी हैं, परमात्मा उन्हीं को प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं ॥५६॥