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Rigveda / 9 / 98 / 3

परि॒ ष्य सु॑वा॒नो अ॑क्षा॒ इन्दु॒रव्ये॒ मद॑च्युतः । धारा॒ य ऊ॒र्ध्वो अ॑ध्व॒रे भ्रा॒जा नैति॑ गव्य॒युः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 98 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अम्बरीष ऋजिष्वा च | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : परि॑ । स्यः । सु॒वा॒नः । अ॒क्षा॒रिति॑ । इन्दुः॑ । अव्ये॑ । मद॑ऽच्युतः । धारा॑ । यः । ऊ॒र्ध्वः । अ॒ध्व॒रे । भ्रा॒जा । न । एति॑ । ग॒व्य॒ऽयुः ॥ ९.९८.३

पदार्थ : (इन्दुः) प्रकाशस्वरूप परमात्मा (मदच्युतः) जो आनन्दमय है, वह (अव्ये) रक्षायोग्य सत्कर्मी पुरुष के अन्तःकरण में (पर्य्यक्षाः) अपना ज्ञानप्रवाह बहाता है, (स्यः) वह (ऊर्ध्वः) सर्वोपरि विराजमान परमात्मा (यः) जो (अध्वरे) अहिंसाप्रधान यज्ञों में (धाराः) अपनी आनन्दमयी वृष्टि से (न) जैसे कि (भ्राजा) दीप्ति अपने प्रकाश्य पदार्थों में दीप्ति डालती है, इसी प्रकार (गव्ययुः) ज्ञानस्वरूप परमात्मा (सुवानः) जो सर्वोत्पादक है, (एति) वह अपनी व्यापक सत्ता से सर्वत्र व्याप्त है ॥३॥

भावार्थ : परमात्मा विद्युत् की दीप्ति के समान सर्वत्र परिपूर्ण है ॥३॥