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Rigveda / 9 / 98 / 12

तं स॑खायः पुरो॒रुचं॑ यू॒यं व॒यं च॑ सू॒रय॑: । अ॒श्याम॒ वाज॑गन्ध्यं स॒नेम॒ वाज॑पस्त्यम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 98 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : अम्बरीष ऋजिष्वा च | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : तम् । स॒खा॒यः॒ । पु॒रः॒ऽरुच॑म् । यू॒यम् । व॒यम् । च॒ । सू॒रयः॑ । अ॒श्याम॑ । वाज॑ऽगन्ध्यम् । स॒नेम॑ । वाज॑ऽपस्त्यम् ॥ ९.९८.१२

पदार्थ : (तम्) उस पूर्वोक्त परमात्मा को जो (वाजगन्ध्यम्) बलस्वरूप है और (पुरोरुचम्) सदा से प्रकाशस्वरूप है, उसको (वयम्) हम (च) और (यूयम्) आप (सूरयः) विद्वान् (सखायः) जो मैत्रीभाव से वर्ताव करते हैं, (वाजपः) जो उसकी अनन्त शक्तियों को अनुभव करना चाहते हैं, वे सब (सनेम) उसकी उपासना करें (अश्याम) और उसके आनन्द को भोगें ॥१२॥

भावार्थ : परमात्मा ही के आनन्द भोगने का प्रयत्न करना चाहिये, क्योंकि सच्चा आनन्द वही है ॥१२॥ यह अट्ठानवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥