Rigveda / 1 / 173 / 7
स॒मत्सु॑ त्वा शूर स॒तामु॑रा॒णं प्र॑प॒थिन्त॑मं परितंस॒यध्यै॑। स॒जोष॑स॒ इन्द्रं॒ मदे॑ क्षो॒णीः सू॒रिं चि॒द्ये अ॑नु॒मद॑न्ति॒ वाजै॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 173 | Mantra No : 7
In English:
Seer : agastyo maitraavaruNiH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : samatsu tvaa shuura sataamuraaNa.m prapathintama.m parita.msayadhyai. sajoShasa indra.m made kShoNiiH suuri.m chidye anumadanti vaajaiH .
Component Words : samat.asu. tvaa. shuura. sataam. uraaNam. prapathin.atamam. pari.ata.msayadhyai. sajoShasaH. indram. made. kShoNiiH. suurim. chit. ye. anu.amadanti. vaajaiH . 1.173.7
In Hindi:
ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब विद्वद्विषय में राज्यप्राप्ति का साधन विषय अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : स॒मत्ऽसु॑। त्वा॒। शू॒र॒। स॒ताम्। उ॒रा॒णम्। प्र॒प॒थिन्ऽत॑मम्। प॒रि॒ऽतं॒स॒यध्यै॑। स॒जोष॑सः। इन्द्र॑म्। मदे॑। क्षो॒णीः। सू॒रिम्। चि॒त्। ये। अ॒नु॒ऽमद॑न्ति। वाजैः॑ ॥ १.१७३.७
पदार्थ : हे (शूर) दुष्टों की हिंसा करनेवाले सेनाधीश ! (ये) जो (सजोषसः) समान प्रीति सेवनेवाले (समत्सु) सङ्ग्रामों में (परितंसयध्यै) सब ओर से भूषित करने के लिये (सताम्) सत्पुरुषों में (उराणम्) अधिक बल करते हुए (प्रपथिन्तमम्) अतिशयता से उत्तम पथगामी (इन्द्रम्) सेनापति (त्वा) तुमको (मदे) हर्ष आनन्द के लिये (क्षोणीः) भूमियों को (सूरिम्) विद्वान् के (चित्) समान (वाजैः) वेगादि गुणयुक्त वीर वा अश्वादिकों के साथ (अनु, मदन्ति) अनुमोद आनन्द देते हैं उनको तूँ भी आनन्दित कर ॥ ७ ॥
भावार्थ : वे ही निर्वैर हैं, जो अपने समान और प्राणियों को जानते हैं। उन्हीं का राज्य बढ़ता है, जो सत्पुरुषों का ही प्रतिदिन सङ्ग करते हैं ॥ ७ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथ प्रकृतविषये राज्यप्राप्तिसाधनमाह ।
पदपाठ : स॒मत्ऽसु॑। त्वा॒। शू॒र॒। स॒ताम्। उ॒रा॒णम्। प्र॒प॒थिन्ऽत॑मम्। प॒रि॒ऽतं॒स॒यध्यै॑। स॒जोष॑सः। इन्द्र॑म्। मदे॑। क्षो॒णीः। सू॒रिम्। चि॒त्। ये। अ॒नु॒ऽमद॑न्ति। वाजैः॑ ॥ १.१७३.७
पदार्थ : (समत्सु) सङ्ग्रामेषु (त्वा) त्वाम् (शूर) दुष्टहिंसक (सताम्) सत्पुरुषाणाम् (उराणम्) बहुबलं कुर्वन्तम् (प्रपथिन्तमम्) अतिशयेन प्रकृष्टपथगामिनम् (परितंसयध्यै) परितः सर्वतस्तंसयितुं भूषयितुम् (सजोषसः) समानप्रीतिसेवनाः (इन्द्रम्) सेनेशम् (मदे) हर्षाय (क्षोणीः) भूमीः (सूरिम्) विद्वांसम् (चित्) इव (ये) (अनु, मदन्ति) (वाजैः) वेगादिगुणयुक्तैर्वीरैरश्वैर्वा ॥ ७ ॥
अन्वय : हे शूर ये सजोषसः समत्सु परितंसयध्यै सतामुराणं प्रपथिन्तममिन्द्रं त्वा मदे क्षोणीः सूरिं चिदिव वाजैरनुमदन्ति ताँस्त्वमप्यनुमन्दय ॥ ७ ॥
भावार्थ : त एव निर्वैरा स्वात्मतुल्यानन्यान् प्राणिनो जानन्ति तेषामेव राज्यं वर्द्धते ये सत्पुरुषाणामेव सङ्गं प्रतिदिनं कुर्वन्ति ॥ ७ ॥