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Rigveda / 9 / 102 / 6

यमी॒ गर्भ॑मृता॒वृधो॑ दृ॒शे चारु॒मजी॑जनन् । क॒विं मंहि॑ष्ठमध्व॒रे पु॑रु॒स्पृह॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 102 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : त्रितः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : यम् । ई॒म् इति॑ । गर्भ॑म् । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । दृ॒शे । चारु॑म् । अजी॑जनन् । क॒विम् । मंहि॑ष्ठम् । अ॒ध्व॒रे । पु॒रु॒ऽस्पृह॑म् ॥ ९.१०२.६

पदार्थ : (ऋतवृधः) यज्ञकर्म्म में कुशल विद्वान् (यमीम्) जिस उक्त परमात्मा के (गर्भं) ज्ञानरूप गर्भ को धारण करते हैं, (दृशे) संसार के प्रकाश के लिये उससे (चारुं) सुन्दर सन्तान को (अजीजनन्) उत्पन्न करते हैं, वह परमात्मा (कविं) सर्वज्ञ (मंहिष्ठं) अत्यन्त पूजनीय और (पुरुस्पृहं) सबका उपास्यदेव है, (अध्वरे) ज्ञानयज्ञों में उक्त परमात्मा उपासनीय है ॥६॥

भावार्थ : जो इस चराचर ब्रह्माण्ड का उत्पादक परमात्मा है, उसकी उपासना ज्ञानयज्ञ, योगयज्ञ, तपोयज्ञ इत्यादि अनन्त प्रकार के यज्ञों द्वारा की जाती है ॥६॥