Rigveda / 9 / 107 / 7
सोमो॑ मी॒ढ्वान्प॑वते गातु॒वित्त॑म॒ ऋषि॒र्विप्रो॑ विचक्ष॒णः । त्वं क॒विर॑भवो देव॒वीत॑म॒ आ सूर्यं॑ रोहयो दि॒वि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 107 | Mantra No : 7
In English:
Seer : saptarShayaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : somo miiDhvaanpavate gaatuvittama RRIShirvipro vichakShaNaH . tva.m kavirabhavo devaviitama aa suurya.m rohayo divi .
Component Words : somaH . miiDhvaan . pavate . gaatuvit.atamaH . RRIShiH . vipraH . vi.achakShaNaH . tvam . kaviH . abhavaH . deva.aviitamaH . aa . suuryam . rohayaH . divi . 9.107.7
In Hindi:
ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय :
पदपाठ : सोमः॑ । मी॒ढ्वान् । प॒व॒ते॒ । गा॒तु॒वित्ऽत॑मः । ऋषिः॑ । विप्रः॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । त्वम् । क॒विः । अ॒भ॒वः॒ । दे॒व॒ऽवीत॑मः । आ । सूर्य॑म् । रो॒ह॒यः॒ । दि॒वि ॥ ९.१०७.७
पदार्थ : हे परमात्मन् ! (त्वम्) आप (सोमः) सर्वोत्पादक हैं, (मीढ्वान्) सब कामनाओं के पूर्ण करनेवाले (गातुवित्तमः) सर्वोपरि मार्ग के दिखलानेवाले हैं, (ऋषिः) “च्छति गच्छति सर्वत्र प्राप्नोतीति ऋषिः”=जो अपनी व्यापकशक्ति से सर्वत्र विद्यमान हो उसका नाम यहाँ ऋषि है। (विप्रः) मेधावी (विचक्षणः) सर्वोपरि विज्ञानी हैं, (कविः) सर्वज्ञ (अभवः) हैं, (देववीतमः) सब विद्वानों के परमप्रिय तथा (दिवि) द्युलोक में (सूर्यम्) सूर्य का (आरोहयः) प्रादुर्भाव करते हैं, उक्त गुणशाली आप उपासकों के अन्तःकरणों को (पवते) पवित्र करते हैं ॥७॥
भावार्थ : इस मन्त्र का आशय यह है कि परमात्मा ज्ञानादि गुणों द्वारा उपासक के हृदय को दीप्तिमान् बनाते हैं ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
पदपाठ : सोमः॑ । मी॒ढ्वान् । प॒व॒ते॒ । गा॒तु॒वित्ऽत॑मः । ऋषिः॑ । विप्रः॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । त्वम् । क॒विः । अ॒भ॒वः॒ । दे॒व॒ऽवीत॑मः । आ । सूर्य॑म् । रो॒ह॒यः॒ । दि॒वि ॥ ९.१०७.७
भावार्थ :