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Rigveda / 9 / 107 / 18

पु॒ना॒नश्च॒मू ज॒नय॑न्म॒तिं क॒विः सोमो॑ दे॒वेषु॑ रण्यति । अ॒पो वसा॑न॒: परि॒ गोभि॒रुत्त॑र॒: सीद॒न्वने॑ष्वव्यत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 107 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : पु॒ना॒नः । च॒मू इति॑ । ज॒नय॑न् । म॒तिम् । क॒विः । सोमः॑ । दे॒वेषु॑ । र॒ण्य॒ति॒ । अ॒पः । वसा॑नः । परि॑ । गोभिः॑ । उत्ऽत॑रः । सीद॑न् । वने॑षु । अ॒व्य॒त॒ ॥ ९.१०७.१८

पदार्थ : (चमू) जीव तथा प्रकृतिरूपी संसार के आधारभूत दोनों शक्तियों को (पुनानः) पवित्र करता तथा (मतिम्) बुद्धि को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ (कविः) सर्वज्ञ (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (देवेषु) सूर्यादि दिव्यशक्तिवाले पदार्थों में (रण्यति) सर्वव्यापक भाव से विराजमान होता है, (अपः, वसानः) कर्मों का अध्यक्ष परमात्मा (गोभिः, उत्तरः) ज्ञानेन्द्रियों द्वारा साक्षात्कार किया हुआ (परिसीदन्) अन्तःकरणों में विराजमान होता तथा (वनेषु) सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों में (परि, अव्यत) सब ओर से रक्षा करता है ॥१८॥

भावार्थ : द्युभ्वादि लोक-लोकान्तर एकमात्र परमात्मा ही के आधार पर स्थित होने से योगीजन सर्वत्र सुरक्षित रहता है ॥१८॥