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Rigveda / 10 / 3 / 5

स्व॒ना न यस्य॒ भामा॑स॒: पव॑न्ते॒ रोच॑मानस्य बृह॒तः सु॒दिव॑: । ज्येष्ठे॑भि॒र्यस्तेजि॑ष्ठैः क्रीळु॒मद्भि॒र्वर्षि॑ष्ठेभिर्भा॒नुभि॒र्नक्ष॑ति॒ द्याम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 3 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : त्रितः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : स्व॒नाः । न । यस्य॑ । भामा॑सः । पव॑न्ते । रोच॑मानस्य । बृ॒ह॒तः । सु॒ऽदिवः॑ । ज्येष्ठे॑भिः । यः । तेजि॑ष्ठैः । क्री॒ळु॒मत्ऽभिः॑ । वर्षि॑ष्ठेभिः । भा॒नुऽभिः॑ । नक्ष॑ति । द्याम् ॥ १०.३.५

पदार्थ : (यस्य बृहतः-रोचमानस्य सुदिवः) जिस महान् प्रकाशमान उत्तम प्रकाशमान द्युस्थानवाले सूर्य के (भामासः) प्रकाशतरङ्ग (स्वनाः-न पवन्ते) स्तुतिवचनवाले जैसे गति करते हैं-प्राप्त होते हैं और (यः) जो सूर्य (ज्येष्ठेभिः) उन श्रेष्ठों (तेजिष्ठैः) अतितेजस्वियों (क्रीडुमद्भिः) क्रीडा वालों-क्रीडा से करते हुओं (वर्षिष्ठेभिः) बढ़े-चढ़े (भानुभिः-द्यां नक्षति) स्वज्योतियों द्वारा द्युलोक को व्याप्त होता है, उस सूर्य को सब विशेषरूप से जानें ॥५॥

भावार्थ : प्रकाशमान सूर्य की प्रकाशतरङ्ग संसार में सर्वत्र क्रीडा सी करती हुई गति करती हैं, उपासक जैसे परमात्मा की स्तुति करते हुए संसार में विचरते हैं और अन्त में मोक्ष में विराजते हैं, ऐसे विद्यासूर्य विद्वान् की ज्ञानतरङ्ग संसार में फैला करती हैं। ऐसा विद्या-सूर्य विद्वान् का परमधाम विद्याधाम-विद्याप्रतिष्ठान है ॥४॥