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Rigveda / 10 / 5 / 1

एक॑: समु॒द्रो ध॒रुणो॑ रयी॒णाम॒स्मद्धृ॒दो भूरि॑जन्मा॒ वि च॑ष्टे । सिष॒क्त्यूध॑र्नि॒ण्योरु॒पस्थ॒ उत्स॑स्य॒ मध्ये॒ निहि॑तं प॒दं वेः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 5 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : त्रितः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : इस सूक्त में अग्नि शब्द से परमात्मा, विद्युत् और सूर्य वर्णित किये जाते हैं।

पदपाठ : एकः॑ । स॒मु॒द्रः । ध॒रुणः॑ । र॒यी॒णाम् । अ॒स्मत् । हृ॒दः । भूरि॑ऽजन्मा । वि । च॒ष्टे॒ । सिस॑क्ति । ऊधः॑ । नि॒ण्योः । उ॒पऽस्थे॑ । उत्स॑स्य । मध्ये॑ । निऽहि॑तम् । प॒दम् । वेरिति॒ वेः ॥ १०.५.१

पदार्थ : (रयीणाम्) विविध पोषक धनों-अन्नों का (समुद्रः-धरुणः-एकः) सम्यक् उदारदाता तथा धारक एकमात्र (भूरिजन्मा) बहुत प्रकार से बहुत स्थानों में उत्पन्न होनेवाला अग्नि (अस्मद् हृदः-विचष्टे) हमारे हार्दिक भावों को विकसित करता है (उपस्थे निण्योः-ऊधः-सिषक्ति) अन्तरिक्ष में गुप्त रस-जल को सींचती है (उत्सस्य मध्ये निहितं पदं वेः) बहने के स्वभाववाले मेघ के अन्दर रखे प्राप्तव्य जलरूप को प्राप्त हुआ विद्युद्रूप अग्नि ॥१॥

भावार्थ : विविध अन्न-धनों का उत्पन्नकर्ता तथा धारक विविधरूप में उत्पन्न हुआ अग्नि है। वह हार्दिक भावों का विकास करता है, अन्तरिक्ष में छिपे सूक्ष्म जल को सींचता है, मेघ में रखे जल को पकड़कर नीचे बिखेरता है। इसी प्रकार विद्युद्रूप अग्नि की तरह विद्वान् ज्ञानामृत की वृष्टि अपने अन्तःस्थल से निकालकर जनसमाज में बिखेरता है। राजा भी विज्ञानसाधनों द्वारा मेघ से तथा कूप आदि द्वारा राष्ट्र में जल पहुँचाकर अन्नादि को उत्पन्न करावे ॥१॥