Rigveda / 10 / 8 / 7
अ॒स्य त्रि॒तः क्रतु॑ना व॒व्रे अ॒न्तरि॒च्छन्धी॒तिं पि॒तुरेवै॒: पर॑स्य । स॒च॒स्यमा॑नः पि॒त्रोरु॒पस्थे॑ जा॒मि ब्रु॑वा॒ण आयु॑धानि वेति ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 8 | Mantra No : 7
In English:
Seer : trishiraastvaaShTraH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : asya tritaH kratunaa vavre antarichChandhiiti.m piturevaiH parasya . sachasyamaanaH pitrorupasthe jaami bruvaaNa aayudhaani veti .
Component Words : asya . tritaH . kratunaa . vavre . antaH . ichChan . dhiitim . pituH . evaiH . parasya . sachasyamaanaH . pitroH . upa.asthe . jaami . bruvaaNaH . aayudhaani . veti . 10.8.7
In Hindi:
ऋषि : त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : अ॒स्य । त्रि॒तः । क्रतु॑ना । व॒व्रे । अ॒न्तः । इ॒च्छन् । धी॒तिम् । पि॒तुः । एवैः॑ । पर॑स्य । स॒च॒स्यमा॑नः । पि॒त्रोः । उ॒पऽस्थे॑ । जा॒मि । ब्रु॒वा॒णः । आयु॑धानि । वे॒ति॒ ॥ १०.८.७
पदार्थ : (अस्य परस्य पितुः) इस उत्कृष्ट पिता पालक परमात्मा की (धीतिम्-इच्छन्-त्रितः) आधारण-उपासना को चाहते हुए-चाहने प्राप्त करने हेतु तीन-स्थूलसूक्ष्मकारण-शरीरों में प्रवेश करनेवाला आत्मा (क्रतुना-अन्तः-वव्रे) अध्यात्मकर्म योगाभ्यास से अपने अन्दर वरता है (पित्रोः-उपस्थे सचस्यमानः जामि ब्रुवाणः) जैसे माता-पिता के आश्रय में सङ्गति को प्राप्त हुआ बालक अपने को पुत्र कहता हुआ और सुरक्षित रहता हुआ (आयुधानि वेति) अध्यात्मबलरूप शस्त्रों को प्राप्त करता है ॥७॥
भावार्थ : परमपिता परमात्मा के आश्रयरूप उपासना के हेतु तीन शरीरों में जानेवाले आत्मा को योगाभ्यास करना चाहिये। बन्धन को काटनेवाले अध्यात्मबलरूप शस्त्र ही हैं। जैसे माता-पिता के आश्रय में बालक सुरक्षित रहता है, ऐसे ही आत्मा परमात्मा के आश्रय में बन्धनरहित निर्भय और सुरक्षित हो जाता है ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : अ॒स्य । त्रि॒तः । क्रतु॑ना । व॒व्रे । अ॒न्तः । इ॒च्छन् । धी॒तिम् । पि॒तुः । एवैः॑ । पर॑स्य । स॒च॒स्यमा॑नः । पि॒त्रोः । उ॒पऽस्थे॑ । जा॒मि । ब्रु॒वा॒णः । आयु॑धानि । वे॒ति॒ ॥ १०.८.७
भावार्थ :