Rigveda / 10 / 10 / 1
ओ चि॒त्सखा॑यं स॒ख्या व॑वृत्यां ति॒रः पु॒रू चि॑दर्ण॒वं ज॑ग॒न्वान् । पि॒तुर्नपा॑त॒मा द॑धीत वे॒धा अधि॒ क्षमि॑ प्रत॒रं दीध्या॑नः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 10 | Mantra No : 1
In English:
Seer : yamii vaivasvatii | Devta : yamo vaivasvataH | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : o chitsakhaaya.m sakhyaa vavRRityaa.m tiraH puruu chidarNava.m jaganvaan . piturnapaatamaa dadhiita vedhaa adhi kShami pratara.m diidhyaanaH .
Component Words : o iti . chit . sakhaayam . sakhyaa . vavRRityaam . tiraH . puru . chit . arNavam . jaganvaan . pituH . napaatam . aa . dadhiita . vedhaaH . adhi . kShami . pra.ataram . diidhyaanaH . 10.10.1
In Hindi:
ऋषि : यमी वैवस्वती | देवता : यमो वैवस्वतः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : इस सूक्त में यम-यमी संवाद से दिन-रात का विज्ञान और गृहस्थधर्मशिक्षण आलङ्कारिक ढंग से कहा गया है।
पदपाठ : ओ इति॑ । चि॒त् । सखा॑यम् । स॒ख्या । व॒वृ॒त्या॒म् । ति॒रः । पु॒रु । चि॒त् । अ॒र्ण॒वम् । ज॒ग॒न्वान् । पि॒तुः । नपा॑तम् । आ । द॒धी॒त॒ । वे॒धाः । अधि॑ । क्षमि॑ । प्र॒ऽत॒रम् । दीध्या॑नः ॥ १०.१०.१
पदार्थ : (पुरु) अपने प्रकाश और तेज से अनेक पृथिवी आदि लोकों को (चित्) चेतानेवाले सूर्य ने (तिरः) सुविस्तृत (अर्णवम्) जलमय अन्तरिक्ष को जब (जगन्वान्) प्राप्त किया अर्थात् उसमें स्थित हुआ, तब पृथिवी के निचले भाग में स्थित यमी-रात कहने लगी कि (चित्) हे चेतनाशील ! अन्यों को चेतानेवाले दिवस ! (सख्या) सखिपन के लिये प्रेम से (सखायम्) तुझ सखारूप पति को (आववृत्याम्-उ) आमन्त्रित करती हूँ, अवश्य आप (अधिक्षमि) इस पृथिवीतल पर नीचे आवें, क्योंकि मैं पृथिवी के अधोभाग में हूँ एवं मेरे समीप आकर (प्रतरम्) दुःख से तराने तथा पितृ-ऋण से अनृण करानेवाली योग्य सन्तान को (दीध्यानः) लक्ष्य में रखते हुए (वेधाः) आप मेधावी (पितुः नपातम्) अपने पिता के पौत्र अर्थात् निजपुत्र को (आदधीत) गर्भाधान रीति से मेरे में स्थापन करो, यह मेरा प्रस्ताव है ॥१॥
भावार्थ : सूर्योदय होने पर दिन पृथिवी के ऊपर और रात्रि नीचे होती है। गृहस्थाश्रम में पति से नम्र हो गृहस्थधर्म की याचना पत्नी करे तथा पितृ-ऋण से अनृण होने के लिये पुत्र की उत्पत्ति करे।प्रस्तुत मन्त्र पर सायण ने जो अश्लील अर्थ दिया है, संदेहनिवृत्ति के लिये उसकी समीक्षा दी जा रही है−१−क्या यहाँ विवस्वान् कोई देहधारी मनुष्य है कि जिसके यम-यमी सन्तानों की कथा वेद वर्णन करता है ? क्या वैदिक काल से पूर्व उनकी उत्पत्ति हो चुकी थी अथवा अलङ्कार है, जैसा कि नवीन लोग कहते हैं कि विवस्वान् सूर्य है, उसका लड़का दिन और लड़की रात्रि है। ऐसा यदि मानते हैं, तो वह अप्रकाशमान निर्जन देश कौनसा है, जहाँ रात्रि गयी ?२−“अर्णवं समुद्रैकदेशमवान्तरद्वीपम्”समीक्षा−यहाँ ‘अर्णवम्’ का अर्थ ‘अवान्तरद्वीपम्’ अत्यन्त गौणलक्षण में ही हो सकता है।३−“जगन्वान् गतवती यमी” यहाँ जगन्वान् पुल्लिङ्ग को स्त्रीलिङ्ग का विशेषण करना शब्द के साथ बलात्कार ही है।४−“ओववृत्याम्=आवर्त्तयामि=त्वत्सम्भोगं करोमि” यहाँ “त्वत्सम्भोगं करोमि=तेरा सम्भोग करती हूँ” यह कहना और सम्भोग की प्रार्थना भी करते जाना यह कितना विपरीत अर्थ है !५−“पितुः=आवयोर्भविष्यतः पुत्रस्य पितृभूतस्य तवार्थाय=हम दोनों के होनेवाले पुत्र का तुझ पितृरूप के निमित्त” यह अर्थ अत्यन्त दुःसाध्य और गौरवदोषयुक्त है।६−अधिक्षमि=अधि पृथिव्यां पृथिवीस्थानीयनभोदरे इत्यर्थः”= “पृथिवीस्थानीय नभोदर में।” द्वीपान्तर में स्थिति और नभोदर में गर्भाधान हो, यह असम्बद्ध अर्थ है।७−“पुत्रस्य जननार्थमावां ध्यायन्नादधीत प्रजापतिः=पुत्रजननार्थ हम दोनों का ध्यान करता हुआ प्रजापति गर्भाधान करे” कितनी असङ्गति है-प्रस्ताव और प्रार्थना पति से और आधान करे प्रजापति ! ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : यमी वैवस्वती | देवता : यमो वैवस्वतः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अत्र सूक्ते यमयमीसंवादेनाहोरात्रविज्ञानं गार्हस्थ्यशिक्षणं चालङ्कारिकत्वेनोच्यते।
पदपाठ : ओ इति॑ । चि॒त् । सखा॑यम् । स॒ख्या । व॒वृ॒त्या॒म् । ति॒रः । पु॒रु । चि॒त् । अ॒र्ण॒वम् । ज॒ग॒न्वान् । पि॒तुः । नपा॑तम् । आ । द॒धी॒त॒ । वे॒धाः । अधि॑ । क्षमि॑ । प्र॒ऽत॒रम् । दीध्या॑नः ॥ १०.१०.१
भावार्थ :