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Rigveda / 10 / 10 / 13

ब॒तो ब॑तासि यम॒ नैव ते॒ मनो॒ हृद॑यं चाविदाम । अ॒न्या किल॒ त्वां क॒क्ष्ये॑व यु॒क्तं परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 10 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : यमी वैवस्वती | देवता : यमो वैवस्वतः | छन्द : स्वराडार्चीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ब॒तः । ब॒त॒ । अ॒सि॒ । य॒म॒ । न । ए॒व । ते॒ । मनः॑ । हृद॑यम् । च॒ । अ॒वि॒दा॒म॒ । अ॒न्या । किल॑ । त्वाम् । क॒क्ष्या॑ऽइव । यु॒क्तम् । परि॑ । स्व॒जा॒ते॒ । लिबु॑जाऽइव । वृ॒क्षम् ॥ १०.१०.१३

पदार्थ : (यम) हे दिवस ! (बत) हा ! दुःख है कि तू (बतः) विवश (असि) है, क्योंकि दैवकृत बाधा को सहसा कोई भी नहीं हटा सकता, इसलिए (ते) तेरे (मनः) मन (च) और (हदयम्) वक्षःस्थल को मैंने (न-एव) नहीं (अविदाम) प्राप्त किया (अन्या किल) मुझ से भिन्न कोई भी स्त्री (कक्ष्या-इव-युक्तम्) कक्ष-काँख में बंधी पेटी के समान सम्यक्प्रकार से (त्वाम्) तुझ को (परिष्वजाते) आलिङ्गन करे अथवा (लिबुजा इव वृक्षम्) जैसे लता वृक्ष को लिपटती है, वैसे तुझ से भी लिपटे ॥१३॥

भावार्थ : यदि स्त्री में कोई दोष है, जिसके कारण वह सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ है, तो उसे भी चाहिए कि वह पति को दूसरी स्त्री से सन्तानोत्पत्ति के लिये अनुमति दे देवे ॥१३॥