Rigveda / 10 / 14 / 14
य॒माय॑ घृ॒तव॑द्ध॒विर्जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत । स नो॑ दे॒वेष्वा य॑मद्दी॒र्घमायु॒: प्र जी॒वसे॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 14 | Mantra No : 14
In English:
Seer : yamaH | Devta : yamaH | Metre : nichRRidanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yamaaya ghRRitavaddhavirjuhota pra cha tiShThata . sa no deveShvaa yamaddiirghamaayuH pra jiivase .
Component Words : yamaaya . ghRRita.avat . haviH . juhota . pra . cha . tiShThata . saH . naH . deveShu . aa . yamat . diirgham . aayuH . pra . jiivase . 10.14.14
In Hindi:
ऋषि : यमः | देवता : यमः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : य॒माय॑ । घृ॒तऽव॑त् । ह॒विः । जु॒होत॑ । प्र । च॒ । ति॒ष्ठ॒त॒ । सः । नः॒ । दे॒वेषु॑ । आ । य॒म॒त् । दी॒र्घम् । आयुः॑ । प्र । जी॒वसे॑ ॥ १०.१४.१४
पदार्थ : (यमाय घृतवत्-हविः-जुहोत प्रतिष्ठत च) पूर्वोक्त जीवनकाल और विश्वकाल को अनुकूल बनाने के लिए घृतसहित ओषधिरसरूप हवि आदि का होम करो और जीवन की उच्चता को प्राप्त होओ (सः नः जीवसे देवेषु दीर्घम्-आयुः प्रायमत्) एवं वह काल हमारे अधिक और उत्तम जीवन के लिये हमारी इन्द्रियों में दीर्घजीवन का विस्तार करे ॥१४॥
भावार्थ : हव्य वस्तुओं में घृत मिलाकर या घृत के साथ हवन करने से इन्द्रिय-शक्तियाँ चिरस्थायी रहती हैं ॥१४॥
In Sanskrit:
ऋषि : यमः | देवता : यमः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : य॒माय॑ । घृ॒तऽव॑त् । ह॒विः । जु॒होत॑ । प्र । च॒ । ति॒ष्ठ॒त॒ । सः । नः॒ । दे॒वेषु॑ । आ । य॒म॒त् । दी॒र्घम् । आयुः॑ । प्र । जी॒वसे॑ ॥ १०.१४.१४
भावार्थ :