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Rigveda / 10 / 15 / 14

ये अ॑ग्निद॒ग्धा ये अन॑ग्निदग्धा॒ मध्ये॑ दि॒वः स्व॒धया॑ मा॒दय॑न्ते । तेभि॑: स्व॒राळसु॑नीतिमे॒तां य॑थाव॒शं त॒न्वं॑ कल्पयस्व ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 15 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : शङ्खो यामायनः | देवता : पितरः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ये । अ॒ग्नि॒ऽद॒ग्धाः । ये । अन॑ग्निऽदग्धाः । मध्ये॑ । दि॒वः । स्व॒धया॑ । मा॒दय॑न्ते । तेभिः॑ । स्व॒ऽराट् । असु॑ऽनीतिम् । ए॒ताम् । य॒था॒ऽव॒शम् । त॒न्व॑म् । क॒ल्प॒य॒स्व॒ ॥ १०.१५.१४

पदार्थ : (ये-अग्निदग्धाः-ये अनग्निदग्धाः-दिवः मध्ये स्वधया मादयन्ते) अग्नितेज या ताप जिन किरणों से बढ़ जाता है, वे ग्रीष्मकाल अर्थात् उत्तरायण के अन्त की तथा उनसे विपरीत शीतकाल अर्थात् दक्षिणायन के अन्त की सूर्यरश्मियाँ, जो आकाश के मध्य में विचरती हुई जलवृष्टि से प्राणियों को जीवन देती हैं (स्वराट् तेभिः-एताम्-असुनीतिं तन्वं यथावशं कल्पयस्व) हे यज्ञ में प्रकाशमानाग्ने ! उन किरणों के द्वारा प्राणसञ्चार के स्थान जीवशरीर को यथायोग्य समर्थ बना ॥१४॥

भावार्थ : उत्तरायण और दक्षिणायन के अन्त में होनेवाली वर्षा की कारणभूत सूर्यकिरणों को आकाश से सुवृष्टि के लिये यज्ञाग्नि प्रेरित करती है, जिस से जीवशरीर यथायोग्य प्राणशक्ति को धारण कर सकता है ॥१४॥