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Rigveda / 10 / 16 / 7

अ॒ग्नेर्वर्म॒ परि॒ गोभि॑र्व्ययस्व॒ सं प्रोर्णु॑ष्व॒ पीव॑सा॒ मेद॑सा च । नेत्त्वा॑ धृ॒ष्णुर्हर॑सा॒ जर्हृ॑षाणो द॒धृग्वि॑ध॒क्ष्यन्प॑र्य॒ङ्खया॑ते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 16 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : दमनो यामायनः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒ग्नेः । वर्म॑ । परि॑ । गोभिः॑ । व्य॒य॒स्व॒ । सम् । प्र । ऊ॒णु॒ष्व॒ । पीव॑सा । मेद॑सा । च॒ । न । इत् । त्वा॒ । धृ॒ष्णुः । हर॑सा । जर्हृ॑षाणः । द॒धृक् । वि॒ऽध॒क्ष्यन् । प॒रि॒ऽअ॒ङ्खया॑ते ॥ १०.१६.७

पदार्थ : (अग्नेः-वर्म गोभिः परिव्ययस्व पीवसा मेदसा च सम्प्रोर्णुष्व) अग्नि के घर अर्थात् चिता को इन्द्रियों और नाड़ियों सहित यह प्रेत भली प्रकार प्राप्त होवे और मांस मेदः-चर्बी द्वारा जलती हुई शववेदि अर्थात् चिता को सम्यक् पूर्णता से प्राप्त हो, क्योंकि (धृष्णुः-जर्हृषाणः-दधृक्-विधक्ष्यन्-नेत्त्वा हरसा पर्यङ्खयाते) प्रसह्यकारी अतिशय से वस्तुमात्र को अकिञ्चित् करनेवाली अग्नि उस प्रेत को विशेषरूपेण जलाती हुई शवाङ्गों को इधर-उधर न फेंक दे ॥७॥

भावार्थ : शवदहनवेदि का परिमाण इतना होना चाहिये कि मृत शरीर सुगमता से पूरा आ जावे और उसके प्रत्येक नस, नाड़ी, मांस, चर्बी आदि अंशों में अग्नि का प्रवेश भली प्रकार हो सके। शवदहन करनेवालों को यह ध्यान रखना चाहिये कि चिता में अग्नि इस प्रकार जलाई जावे कि वह अतितीक्ष्ण और बलवान् होकर विपरीतता से जलाती हुई शवाङ्गों को इधर-उधर न फेंक दे ॥७॥