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Rigveda / 10 / 16 / 10

यो अ॒ग्निः क्र॒व्यात्प्र॑वि॒वेश॑ वो गृ॒हमि॒मं पश्य॒न्नित॑रं जा॒तवे॑दसम् । तं ह॑रामि पितृय॒ज्ञाय॑ दे॒वं स घ॒र्ममि॑न्वात्पर॒मे स॒धस्थे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 16 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : दमनो यामायनः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यः । अ॒ग्निः । क्र॒व्य॒ऽअत् । प्र॒ऽवि॒वेश॑ । वः॒ । गृ॒हम् । इ॒मम् । पश्य॑न् । इत॑रम् । जा॒तऽवे॑दसम् । तम् । ह॒रा॒मि॒ । पि॒तृ॒ऽयज्ञाय॑ । दे॒वम् । सः । घ॒र्मम् । इ॒न्वा॒त् । प॒र॒मे । स॒धऽस्थे॑ ॥ १०.१६.१०

पदार्थ : (यः क्रव्यात्-अग्निः-वः-गृहं प्रविवेश) हे प्रेतहारो ! जो शवदहनाग्नि तुम्हारे शरीर में प्रविष्ट हुई है, (इमम्-इतरं जातवेदसं पश्यन्) मैं इस दूसरी अग्नि को प्रयुक्त करता हुआ-होमाहुति द्वारा सम्पादन करता हुआ (तं देवं हरामि पितृयज्ञाय) उस क्रव्याद् शवगन्धाग्नि को पृथक् करता हूँ, जिससे आपका प्राणसञ्चार सुखमय हो सके (सः-परमे सधस्थे घर्मम्-इन्वात्) वह शवगन्धाग्नि ऊपर आकाशसूर्य को लक्ष्य करके व्याप्त हो जावे ॥१०॥

भावार्थ : चिताग्नि में दी हुई होमाहुति प्रेतहारों के भीतर घुसी शवगन्धाग्नि के सम्पर्क को हटाती है, जिससे उनके जीवन प्राण में खराबी नहीं आती, किन्तु सूक्ष्म होकर ऊपर आकाश में शवगन्ध छिन्न-भिन्न हो जाती है ॥१०॥