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Rigveda / 10 / 17 / 14

पय॑स्वती॒रोष॑धय॒: पय॑स्वन्माम॒कं वच॑: । अ॒पां पय॑स्व॒दित्पय॒स्तेन॑ मा स॒ह शु॑न्धत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 17 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : देवश्रवा यामायनः | देवता : आपः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : पय॑स्वतीः । ओष॑धयः । पय॑स्वत् । मा॒म॒कम् । वचः॑ । अ॒पाम् । पय॑स्वत् । इत् । पयः॑ । तेन॑ । मा॒ । स॒ह । शु॒न्ध॒त॒ ॥ १०.१७.१४

पदार्थ : (ओषधयः पयस्वतीः) ओष-ताप को पीनेवाली समाप्त करनेवाली रसभरी ओषधियाँ सारवती गुणवती होवें (मामकं वचः पयस्वत्) उनके सेवन से मेरा स्तुतिवचन रसवाला हो (अपां पयः पयस्वत्) जलों का रस भी बहुत गुणवाला हो (तेन सह मा शुन्धत) उस गुणवाले रस से मुझे शुद्ध कर ॥१४॥

भावार्थ : परमात्मा की कृपा से ओषधियाँ मानवों के लिए गुणवती एवं ताप को-रोग को दूर करनेवाली होती हैं। उनके ठीक सेवन से परमात्मा का स्तुतिवचन सफल होता है। इसी प्रकार जल भी बहुत गुणवाला होता है, जो हमारा अनेक प्रकार से शोधन करता है ॥१४॥