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Rigveda / 10 / 18 / 12

उ॒च्छ्वञ्च॑माना पृथि॒वी सु ति॑ष्ठतु स॒हस्रं॒ मित॒ उप॒ हि श्रय॑न्ताम् । ते गृ॒हासो॑ घृत॒श्चुतो॑ भवन्तु वि॒श्वाहा॑स्मै शर॒णाः स॒न्त्वत्र॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 18 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : सङ्कुसुको यामायनः | देवता : पितृमेधः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : उ॒त्ऽश्वञ्च॑माना । पृ॒थि॒वी । सु । ति॒ष्ठ॒तु॒ । स॒हस्र॑म् । मितः॑ । उप॑ । हि । श्रय॑न्ताम् । ते । गृ॒हासः॑ । घृ॒त॒ऽश्चुतः॑ । भ॒व॒न्तु॒ । वि॒श्वाहा॑ । अ॒स्मै॒ । श॒र॒णाः । स॒न्तु॒ । अत्र॑ ॥ १०.१८.१२

पदार्थ : (उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सुतिष्ठतु) जब पुलकितपृष्टा उफनी हुई-पोली सी बनी हुई पृथिवी तैयार हो जाती है तब (सहस्रं मितः-हि-उपश्रयन्ताम्) बहुसंख्या प्राप्त जीव उसके आश्रित रहते हैं (ते गृहासः-घृतश्चुतः-भवन्तु-अस्मै विश्वाहा-अत्र शरणाः सन्तु) जीवात्मा के लिए वे गर्भगृह रसपूर्ण और सर्वदा आश्रय देनेवाले होते हैं ॥१२॥

भावार्थ : जीवसृष्टि के लिए पृथिवी ऊपर पोली और मृदु कुछ काल तक बनी रहती है। पुनः उनमें असंख्य जीव आश्रित रहते हैं, अत एव आज तक भी स्व-स्वजातीय सङ्घ में रहने का स्वभाव प्रायः सभी जीवों में वर्तमान है। आत्मा के लिए गर्भगृह स्वाभाविक रस देते हुए शरणीय हैं ॥१२॥