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Rigveda / 10 / 19 / 5

य उ॒दान॒ड्व्यय॑नं॒ य उ॒दान॑ट् प॒राय॑णम् । आ॒वर्त॑नं नि॒वर्त॑न॒मपि॑ गो॒पा नि व॑र्तताम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 19 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : मथितो यामायनो भृगुर्वा वारुणिश्च्यवनों वा भार्गवः | देवता : आपो गावो वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : यः । उ॒त्ऽआन॑ट् । वि॒ऽअय॑नम् । यः । उ॒त्ऽआन॑ट् । प॒रा॒ऽअय॑नम् । आ॒ऽवर्त॑नम् । नि॒ऽवर्त॑नम् । अपि॑ । गो॒पाः । नि । व॒र्त॒ता॒म् ॥ १०.१९.५

पदार्थ : (यः गोपाः) जो गौवों, प्रजाओं, इन्द्रियों का स्वामी परमात्मा है, और (व्ययनम्-उदानट्) जो विशिष्ट गमन का अधिष्ठाता है (यः परायणम् उदानट्) जो परगमन का भी अधिष्ठाता है (आवर्तनं निवर्तनम्-अपि) और जो सुखसाधन के प्रवर्तन और दुःख से निवर्तन का भी अधिष्ठाता है (गोपाः निवर्तताम्) वह गौवों, प्रजाओं और इन्द्रियों का रक्षक परमात्मा हमें प्राप्त हो ॥५॥

भावार्थ : गौवों, प्रजाओं, इन्द्रियों का रक्षक परमात्मा उनकी सारी गति प्रवृत्तियों का अधिष्ठाता है। वह हमें प्राप्त हो ॥५॥