Rigveda / 10 / 20 / 2
अ॒ग्निमी॑ळे भु॒जां यवि॑ष्ठं शा॒सा मि॒त्रं दु॒र्धरी॑तुम् । यस्य॒ धर्म॒न्त्स्व१॒॑रेनी॑: सप॒र्यन्ति॑ मा॒तुरूध॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 20 | Mantra No : 2
In English:
Seer : vimada aindraH praajaapatyo vaa vasukRRidvaa vaasukraH | Devta : agniH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : agnimiiLe bhujaa.m yaviShTha.m shaasaa mitra.m durdhariitum . yasya dharmantsva1reniiH saparyanti maaturuudhaH .
Component Words : agnim . iiLe . bhujaam . yaviShTham . shaasaa . mitram . duH.adhariitum . yasya . dharman . svaH . eniiH . saparyanti . maatuH . uudhaH . 10.20.2
In Hindi:
ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । भु॒जाम् । यवि॑ष्ठम् । शा॒सा । मि॒त्रम् । दुः॒ऽधरी॑तुम् । यस्य॑ । धर्म॑न् । स्वः॑ । एनीः॑ । स॒प॒र्यन्ति॑ । मा॒तुः । ऊधः॑ ॥ १०.२०.२
पदार्थ : (भुजाम्) भोगप्रद पालकों के मध्य में (यविष्ठम्) अतिशय से मिश्रणधर्मी समागम-कर्ता को (शासा मित्रं दुर्धरीतुम्) ज्ञानशिक्षण से मित्र तथा शासन-दण्डप्रदान से दुर्धारणीय को (अग्निम्) परमात्मा या राजा को (ईडे) प्रशंसित करता हूँ-स्तुत करता हूँ (यस्य धर्मन्) जिसके धारण करने योग्य ज्ञान या ज्ञापन में (एनीः स्वः सपर्यन्ति) प्रगतिशील मानवप्रजाएँ सुखप्राप्ति के लक्ष्य से उसे सत्कृत पर प्राप्त होते हैं (मातुः-ऊधः) माता के दुग्धाधान स्तन को जैसे बच्चे प्राप्त होते हैं ॥२॥
भावार्थ : समस्त पालकों में उपासक के लिए परमात्मा और प्रजा के लिए राजा मित्रसमान और विरोधी के लिए दण्डदाता है। उसकी स्तुति या प्रशंसा करनी चाहिए। उपासक और प्रजा सुख को लक्ष्य करके उसका सत्कार कर प्राप्त करते हैं, जैसे बच्चे माता के स्तन को प्राप्त होते हैं ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । भु॒जाम् । यवि॑ष्ठम् । शा॒सा । मि॒त्रम् । दुः॒ऽधरी॑तुम् । यस्य॑ । धर्म॑न् । स्वः॑ । एनीः॑ । स॒प॒र्यन्ति॑ । मा॒तुः । ऊधः॑ ॥ १०.२०.२
भावार्थ :