Rigveda / 10 / 22 / 14
अ॒ह॒स्ता यद॒पदी॒ वर्ध॑त॒ क्षाः शची॑भिर्वे॒द्याना॑म् । शुष्णं॒ परि॑ प्रदक्षि॒णिद्वि॒श्वाय॑वे॒ नि शि॑श्नथः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 22 | Mantra No : 14
In English:
Seer : vimada aindraH praajaapatyo vaa vasukRRidvaa vaasukraH | Devta : indra: | Metre : paadnichRRidbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ahastaa yadapadii vardhata kShaaH shachiibhirvedyaanaam . shuShNa.m pari pradakShiNidvishvaayave ni shishnathaH .
Component Words : ahastaa . yat . apadii . vardhata . kShaaH . shachiibhiH . vedyaanaam . shuShNam . pari . pra.adakShiNit . vishva.aaayave . ni . shishnathaH . 10.22.14
In Hindi:
ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पाद्निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय :
पदपाठ : अ॒ह॒स्ता । यत् । अ॒पदी॑ । वर्ध॑त । क्षाः । शची॑भिः । वे॒द्याना॑म् । शुष्ण॑म् । परि॑ । प्र॒ऽद॒क्षि॒णित् । वि॒श्वऽआ॑यवे । नि । शि॒श्न॒थः॒ ॥ १०.२२.१४
पदार्थ : (यत्-अहस्ता अपदी क्षाः) जो दोनों हाथों से न ग्राह्य, न पैरों से प्राप्त होने योग्य, ऐसी अध्यात्मभूमि (वेद्यानां शचीभिः-वर्धते) वेदितव्य निवेदन करने योग्य स्तुतियों द्वारा परमात्मा साक्षात् होता है (विश्वायवे) पूर्ण आयु प्राप्त कराने के लिए (शुष्णं परि प्रदक्षिणित्) शोषण करनेवाले-बन्धन करनेवाले राग आदि पापों को परमात्मा सब ओर से दबाकर (निशिश्नथः) नष्ट करता है ॥१४॥ अथवा− (यत्-अहस्ता अपदी-क्षाः) जो हाथों से बन्धन में न करने योग्य और न पैरों से बन्धन में करने योग्य राष्ट्रप्रजा अथवा न हाथों द्वारा कर्षण योग्य-खेती करने अयोग्य न पैरों द्वारा यात्रा करने योग्य, ऐसी सकण्टका भूमि (वेद्यानां शचीभिः-वर्धते) वेदितव्य प्रजाओं तथा कर्मों द्वारा सुखसम्पन्न होती है-बढ़ती है (विश्वायवे) सर्वजन के जीवनार्थ (शुष्णं परि प्रदक्षिणित्) शोषक प्रजाघातक चोर आदि हिंसक तथा दुर्भिक्ष को सब ओर से शोधकर (नि शिश्नथः) राजा नष्ट करता है ॥१४॥
भावार्थ : जो हाथों से न ग्रहण करने योग्य, न पैरों से प्राप्त करने योग्य आध्यात्मभूमि-योगभूमि होती है, वह निवेदन करने योग्य स्तुतियों द्वारा बढ़ती है-सम्पुष्ट होती है। मोक्षसम्बन्धी आयु को प्राप्त कराने के लिए परमात्मा बन्धनकारक रागादि को सर्वथा नष्ट कर देता है एवं राजा जो प्रजा न हाथों और न पैरों से बन्धन के योग्य-अनुशासनरहित है और जो भूमि हाथों से खेती करने के अयोग्य और पदयात्रा के अयोग्य कण्टकाकीर्ण है, उस ऐसी प्रजा एवं भूमि को राजा उपयोगी बनाता है ज्ञानशिक्षाओं से या विविध उपायों से। जो प्रजाओं में या राष्ट्रभूमि में औरों का शोषण करनेवाले चोर आदि या दुर्भिक्ष कदाचित् आ जाएँ, उन्हें नष्ट करता है ॥१४॥
In Sanskrit:
ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पाद्निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
पदपाठ : अ॒ह॒स्ता । यत् । अ॒पदी॑ । वर्ध॑त । क्षाः । शची॑भिः । वे॒द्याना॑म् । शुष्ण॑म् । परि॑ । प्र॒ऽद॒क्षि॒णित् । वि॒श्वऽआ॑यवे । नि । शि॒श्न॒थः॒ ॥ १०.२२.१४
भावार्थ :