Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 24 / 4

यु॒वं श॑क्रा माया॒विना॑ समी॒ची निर॑मन्थतम् । वि॒म॒देन॒ यदी॑ळि॒ता नास॑त्या नि॒रम॑न्थतम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 24 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : अश्विनौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : यु॒वम् । श॒क्रा॒ । मा॒या॒ऽविना॑ । स॒मी॒ची इति॑ स॒म्ऽई॒ची । निः । अ॒म॒न्थ॒त॒म् । वि॒ऽम॒देन॑ । यत् । ई॒ळि॒ता । नास॑त्या । निः॒ऽअम॑न्थतम् ॥ १०.२४.४

पदार्थ : (शक्रा) राष्ट्र-संचालन में समर्थ (मायाविना) प्रज्ञावान्-बुद्धिमान् (समीची) परस्पर एक मतिवाले (नासत्या) नियम से सत्यव्यवहार करनेवाले सभापति एवं सेनापति (युवम्) तुम दोनों (निरमन्थतम्) राष्ट्रैश्वर्य को निष्पन्न करो-सिद्ध करो (यत्-ईळिता) जब तुम राष्ट्रैश्वर्य के निष्पादन में युक्त होवो, तब (मदेन वि) आनन्द से विराजमान होकर (निर्-अमन्थतम्) राष्ट्रैश्वर्य को सिद्ध करते हो ॥४॥

भावार्थ : बुद्धिमान् सभापति और सेनापति राष्ट्रैश्वर्य को सिद्ध करते हैं और आनन्द से विराजमान हुए प्रजा के सुख को सिद्ध करते हैं ॥४॥