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Rigveda / 1 / 179 / 2

ये चि॒द्धि पूर्व॑ ऋत॒साप॒ आस॑न्त्सा॒कं दे॒वेभि॒रव॑दन्नृ॒तानि॑। ते चि॒दवा॑सुर्न॒ह्यन्त॑मा॒पुः समू॒ नु पत्नी॒र्वृष॑भिर्जगम्युः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 179 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : लोपमुद्राऽगस्त्यौ | देवता : दम्पती | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ये। चि॒त्। हि। पूर्वे॑। ऋ॒त॒ऽसापः॑। आस॑न्। सा॒कम्। दे॒वेभिः॑। अव॑दन्। ऋ॒तानि॑। ते। चि॒त्। अव॑। अ॒सुः॒। न॒हि। अन्त॑म्। आ॒पुः। सम्। ऊँ॒ इति॑। नु। पत्नीः॑। वृष॑ऽभिः। ज॒ग॒म्युः॒ ॥ १.१७९.२

पदार्थ : (ये) जो (ऋतसापः) सत्यव्यवहार में व्यापक वा दूसरों को व्याप्त करानेवाले (पूर्वे) पूर्व विद्वान् (देवेभिः) विद्वानों के (साकम्) साथ (ऋतानि) सत्यव्यवहारों को (अवदन्) करते हुए (ते, चित्, हि) वे भी सुखी (आसन्) हुए और जो (नु) शीघ्र (पत्नीः) स्त्रीजन (वृषभिः) वीर्य्यवान् पतियों के साथ (सम्, जगम्युः) निरन्तर जावें (चित्) उनके समान (अवासुः) दोषों को दूर करें वे (उ) (अन्तम्) अन्त को (नहि) नहीं (आपुः) प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ब्रह्मचर्य्यस्थ विद्यार्थियों को उन्हीं से विद्या और अच्छी शिक्षा लेनी चाहिये कि जो पहिले विद्या पढ़े हुए सत्याचारी जितेन्द्रिय हों और उन ब्रह्मचारियों के साथ विवाह करें, जो अपने तुल्य गुण, कर्म, स्वभाववाली विदुषी हों ॥ २ ॥