Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 26 / 3

स वे॑द सुष्टुती॒नामिन्दु॒र्न पू॒षा वृषा॑ । अ॒भि प्सुर॑: प्रुषायति व्र॒जं न॒ आ प्रु॑षायति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 26 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : पूषा | छन्द : ककुम्मत्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : सः । वे॒द॒ । सु॒ऽस्तु॒ती॒नाम् । इन्दुः॑ । न । पू॒षा । वृषा॑ । अ॒भि । प्सुरः॑ । प्रु॒षा॒य॒ति॒ । व्र॒जम् । नः॒ । आ । प्रु॒षा॒य॒ति॒ ॥ १०.२६.३

पदार्थ : (पूषा) पोषणकर्त्ता परमात्मा (इन्दुः-न वृषा) चन्द्रमा की भाँति आनन्दवर्षक (सः-सुष्टुतीनां वेद) वह हमारी शोभन स्तुतियों को जानता है, तदनुसार अनुग्रह करता है (प्सुरः-अभि प्रुषायति) साक्षात् हुआ अपने आनन्दरस से हम उपासकों को सींचता है-तृप्त करता है (नः-वज्रम्-आ प्रुषायति) हमारे इन्द्रियस्थान को अपने आनन्दरस से भरपूर करता है ॥३॥

भावार्थ : पोषणकर्त्ता परमात्मा स्तुतियों द्वारा चन्द्रमा की भाँति अपने आनन्द रस से उपासकों को तृप्त करता है और प्रत्येक इन्द्रियस्थान में भी अपने आनन्द की अनुभूति कराता है ॥३॥