Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 26 / 5

प्रत्य॑र्धिर्य॒ज्ञाना॑मश्वह॒यो रथा॑नाम् । ऋषि॒: स यो मनु॑र्हितो॒ विप्र॑स्य यावयत्स॒खः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 26 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : पूषा | छन्द : पादनिचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : प्रति॑ऽअर्धिः । य॒ज्ञाना॑म् । अ॒श्व॒ऽह॒यः । रथा॑नाम् । ऋषिः॑ । सः । यः । मनुः॑ऽहितः । विप्र॑स्य । य॒व॒य॒त्ऽस॒खः ॥ १०.२६.५

पदार्थ : (यज्ञानां प्रत्यर्धिः) श्रेष्ठ कर्मों का प्रतिवर्धक-अत्यन्त बढ़ानेवाला या पोषक (रथानाम्-अश्वहयः) रमणीय पदार्थों का व्यापक प्रेरणा करनेवाले (सः-यः-मनु-हितः) वह परमात्मा मननशील उपासकों का हितकर है (विप्रस्य यावयत्सखः) बुद्धिमान् उपासकों का समागम करनेवाला मित्र (ऋषिः) सर्वज्ञ परमात्मा है ॥५॥

भावार्थ : परमात्मा समस्त श्रेष्ठ कर्मों का पोषक, रमणीय पदार्थों का महान् प्रेरक, मननशील उपासकों का हितकर मिलनेवाला मित्र और पोषणकर्त्ता सर्वज्ञ है ॥५॥