Rigveda / 10 / 27 / 4
यदज्ञा॑तेषु वृ॒जने॒ष्वासं॒ विश्वे॑ स॒तो म॒घवा॑नो म आसन् । जि॒नामि॒ वेत्क्षेम॒ आ सन्त॑मा॒भुं प्र तं क्षि॑णां॒ पर्व॑ते पाद॒गृह्य॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vasukra aindraH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yadaj~naateShu vRRijaneShvaasa.m vishve sato maghavaano ma aasan . jinaami vetkShema aa santamaabhu.m pra ta.m kShiNaa.m parvate paadagRRihya .
Component Words : yat . aj~naateShu . vRRijaneShu . aasam . vishve . sataH . magha.avaanaH . me . aasan . jinaami . vaa . it . kSheme . aa . santam . aabhum . pra . tam . kShiNaam . parvate . paada.agRRihya . 10.27.4
In Hindi:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : यत् । अज्ञा॑तेषु । वृ॒जने॑षु । आस॑म् । विश्वे॑ । स॒तः । म॒घऽवा॑नः । मे॒ । आ॒स॒न् । जि॒नामि॑ । वा॒ । इत् । क्षेमे॑ । आ । सन्त॑म् । आ॒भुम् । प्र । तम् । क्षि॒णा॒म् । पर्व॑ते । पा॒द॒ऽगृह्य॑ ॥ १०.२७.४
पदार्थ : (यत्) जिससे (अज्ञातेषु वृजनेषु) अन्यों के द्वारा न जानने योग्य बलों में (आसम्) मैं वर्त्तमान हूँ (मे-सतः-मघवानः-आसन्) उस मेरी प्राप्ति के लिये अध्यात्मयज्ञ करनेवाले उपासक हैं (वा-इत्) और (क्षेमे) उपासकों के कल्याणनिमित्त (आभुं सन्तम्) आक्रमणकारी महान् पाप या पापी को (जिनामि) निर्बल करता हूँ-दबाता हूँ (तं पादगृह्य पर्वते प्रक्षिणाम्) उसे पैरों में बाँध जैसे निष्क्रिय करके पर्ववाले विषम स्थान-गहन कष्टमय स्थान में फैंकता हूँ-नष्ट करता हूँ ॥४॥
भावार्थ : परमात्मा के बल अनन्त हैं, जो कि मनुष्यों द्वारा न जानने योग्य हैं। अध्यात्मयज्ञ करनेवाले उपासक उसे जानते हैं-मानते हैं। उसके कल्याण के निमित्त आक्रमणकारी पाप और पापी को अपने अज्ञात बलों से वह नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : यत् । अज्ञा॑तेषु । वृ॒जने॑षु । आस॑म् । विश्वे॑ । स॒तः । म॒घऽवा॑नः । मे॒ । आ॒स॒न् । जि॒नामि॑ । वा॒ । इत् । क्षेमे॑ । आ । सन्त॑म् । आ॒भुम् । प्र । तम् । क्षि॒णा॒म् । पर्व॑ते । पा॒द॒ऽगृह्य॑ ॥ १०.२७.४
भावार्थ :