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Rigveda / 10 / 30 / 7

यो वो॑ वृ॒ताभ्यो॒ अकृ॑णोदु लो॒कं यो वो॑ म॒ह्या अ॒भिश॑स्ते॒रमु॑ञ्चत् । तस्मा॒ इन्द्रा॑य॒ मधु॑मन्तमू॒र्मिं दे॑व॒माद॑नं॒ प्र हि॑णोतनापः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 30 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूषः | देवता : आप अपान्नपाद्वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यः । वः॒ । वृ॒ताभ्यः॑ । अकृ॑णोत् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् । यः । वः॒ । म॒ह्याः । अ॒भिऽश॑स्तेः । अमु॑ञ्चत् । तस्मै॑ । इन्द्रा॑य । मधु॑ऽमन्तम् । ऊ॒र्मिम् । दे॒व॒ऽमाद॑नम् । प्र । हि॒णो॒त॒न॒ । आ॒पः ॥ १०.३०.७

पदार्थ : (यः) जो राजा (वः-वृताभ्यः-लोकम्-अकृणोत्-उ) तुम वरण की हुई-प्रजाभाव से स्वीकार की हुई प्रजाओं के लिये सुखप्रद स्थान सम्पन्न करता है (यः) और जो (वः) तुम्हें (मह्याः-अभिशस्तेः-अमुञ्चत्) शत्रु द्वारा प्रेरित महती हिंसा से छुड़ाता है-बचाता है (तस्मै-इन्द्राय) उस राजा के लिए (आपः-मधुमन्तं देवमादनम्-ऊर्मिं प्र हिणोतन) हे प्रजाओं-प्रजाजनों ! तुम इन्द्रियप्रसादक मधु उन्नत अर्थात् उत्तम उपहार को समर्पित करो ॥७॥

भावार्थ : राजा जैसे प्रजाओं को कृपा और रक्षा से स्वीकार करता है-अपनाता है तथा विरोधी के प्रहारों से बचाता है, वैसे ही प्रजा को भी राजा के लिये भाँति-भाँति की उत्तम वस्तुएँ भेंट देनी चाहिये ॥७॥