Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 30 / 11

हि॒नोता॑ नो अध्व॒रं दे॑वय॒ज्या हि॒नोत॒ ब्रह्म॑ स॒नये॒ धना॑नाम् । ऋ॒तस्य॒ योगे॒ वि ष्य॑ध्व॒मूध॑: श्रुष्टी॒वरी॑र्भूतना॒स्मभ्य॑मापः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 30 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूषः | देवता : आप अपान्नपाद्वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : हि॒नोत॑ । नः॒ । अ॒ध्व॒रम् । दे॒व॒ऽय॒ज्या । हि॒नोत॑ । ब्रह्म॑ । स॒नये॑ । धना॑नाम् । ऋ॒तस्य॑ । योगे॑ । वि । स्य॒ध्व॒म् । ऊधः॑ । श्रु॒ष्टी॒ऽवरीः॑ । भू॒त॒न॒ । अ॒स्मभ्य॑म् । आ॒पः॒ ॥ १०.३०.११

पदार्थ : (देवयज्या) हे ऋत्विग् जनों ! तुम लोग इष्ट देव परमात्मा की सङ्गति के लिए (नः-अध्वरं हिनोत) हमारे राजसूययज्ञ को अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्राप्ति के लिए प्रगति दो, भलीभाँति रचाओ तथा, (धनानां सनये) मोक्षैश्वर्य की सम्प्राप्ति के लिये (ब्रह्म हिनोत) स्तुतिवचन को प्रवृद्ध करो-उच्चरित करो (ऋतस्य योगे) उक्त यज्ञ के प्रयोग में (आपः) हे प्रजाजनों ! (ऊधः-विष्यध्वम्) राष्ट्र के सुखसम्पत्तिप्रद कोष को खोलो या उद्घाटित करो (अस्मभ्यं श्रुष्टीवरीः-भूतन) हमारे लिये सुख देनेवाली होओ ॥११॥

भावार्थ : राजसूययज्ञ को पुरोहितजन आस्तिक भावों तथा परमात्मा के विशेष स्तुति-वचनों द्वारा प्रारम्भ करें और बढ़ावें, प्रजाजनों का पूर्ण सहयोग प्राप्त करें, जिससे कि राजा-प्रजा दोनों राष्ट्रसम्पत्ति से सुख प्राप्त करें-सुखलाभ लें ॥११॥