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Rigveda / 10 / 31 / 6

अ॒स्येदे॒षा सु॑म॒तिः प॑प्रथा॒नाभ॑वत्पू॒र्व्या भूम॑ना॒ गौः । अ॒स्य सनी॑ळा॒ असु॑रस्य॒ योनौ॑ समा॒न आ भर॑णे॒ बिभ्र॑माणाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 31 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूषः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒स्य । इत् । ए॒षा । सु॒ऽम॒तिः । प॒प्र॒था॒ना । अभ॑वत् । पू॒र्व्या । भूम॑ना । गौः । अ॒स्य । सऽनी॑ळाः । असु॑रस्य । योनौ॑ । स॒मा॒ने । आ । भर॑णे । बिभ्र॑माणाः ॥ १०.३१.६

पदार्थ : (अस्य-इत्) इस परमात्मा की (एषा पूर्व्या सुमतिः-गौः) यह अच्छी स्तुतियोग्य शाश्वतिक-सदा से चली आई वाणी (पप्रथाना भूमना-अभवत्) विस्तार को प्राप्त होती हुई बहुत रूपवाली है (अस्य-असुरस्य) इन सबको प्राण देनेवाले परमात्मा के (समाने योनौ) समान आश्रय (भरणे) धरणीय स्वरूप में (बिभ्रमाणाः) अपने को समर्पित करते हुए (सनीळाः-आ) समानस्थानी होकर रहें ॥६॥

भावार्थ : प्राणस्वरूप परमात्मा की स्तुति शाश्वतिक वेदवाणी द्वारा विस्तृत होती है। तदनुसार स्तुति करनेवाले मोक्ष में समान आश्रय को प्राप्त होते हैं ॥६॥