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Rigveda / 10 / 39 / 2

चो॒दय॑तं सू॒नृता॒: पिन्व॑तं॒ धिय॒ उत्पुरं॑धीरीरयतं॒ तदु॑श्मसि । य॒शसं॑ भा॒गं कृ॑णुतं नो अश्विना॒ सोमं॒ न चारुं॑ म॒घव॑त्सु नस्कृतम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 39 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : घोषा काक्षीवती | देवता : अश्विनौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : चो॒दय॑तम् । सू॒नृताः॑ । पिन्व॑तम् । धियः॑ । उत् । पुर॑म्ऽधीः । ई॒र॒य॒त॒म् । तत् । उ॒श्म॒सि॒ । य॒शस॑म् । भा॒गम् । कृ॒णु॒त॒म् । नः॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । सोम॑म् । न । चारु॑म् । म॒घव॑त्ऽसु । नः॒ । कृ॒त॒म् ॥ १०.३९.२

पदार्थ : (अश्विना) हे अध्यापक-उपदेशको ! या विद्युत् की शुष्क और आर्द्र धाराओ ! (सूनृताः-चोदयतम्) अपनी वाणियों को या उषाज्योतियों को प्रेरित करो (धियः पिन्वतम्) बुद्धियों या कर्मों को बढ़ाओ (पुरन्धीः-उत् ईरयतम्) बहुत प्रज्ञानवाली बुद्धियों को खूब बढाओ (तत्-उश्मसि) इन तीनों को हम चाहते हैं (नः-यशसं भागं कुरुतम्) हमारे यशोरूप सदाचारमय अधिकार का सम्पादन करो (मघवत्सु सोमं न चारुं नः-कृतम्) अध्यात्म-यज्ञवालों या ऐश्वर्यवालों में सुन्दर चन्द्रमा की भाँति पुष्कल ऐश्वर्य प्रदान करो ॥२॥

भावार्थ : आध्यापक और उपदेशक हमारे अन्दर अपने उपदेश से बुद्धियों का विकास करते हैं। श्रेष्ठकर्म में प्रवृत्त करते हैं। हमें अपने मानवीय जीवनभाग सदाचार की प्रेरणा देते हैं और सुन्दर ऐश्वर्य को प्रदान करते है और विद्युत् की दो धाराएँ हमारे बुद्धिविकास का कारण बनती हैं। विशेष क्रिया द्वारा ऐश्वर्य भी प्राप्त कराती हैं ॥२॥