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Rigveda / 10 / 39 / 8

यु॒वं विप्र॑स्य जर॒णामु॑पे॒युष॒: पुन॑: क॒लेर॑कृणुतं॒ युव॒द्वय॑: । यु॒वं वन्द॑नमृश्य॒दादुदू॑पथुर्यु॒वं स॒द्यो वि॒श्पला॒मेत॑वे कृथः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 39 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : घोषा काक्षीवती | देवता : अश्विनौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : यु॒वम् । विप्र॑स्य । ज॒र॒णाम् । उ॒प॒ऽई॒युषः॑ । पुन॒रिति॑ । क॒लेः । अ॒कृ॒णु॒त॒म् । यु॒व॒त् । वयः॑ । यु॒वम् । वन्द॑नम् । ऋ॒श्य॒ऽदात् । उत् । ऊ॒प॒थुः॒ । यु॒वम् । स॒द्यः । वि॒श्पला॑म् । एत॑वे । कृ॒थः॒ ॥ १०.३९.८

पदार्थ : (युवं कलेः-विप्रस्य) तुम दोनों अध्यापक और उपदेशक ज्ञान के संकलन करनेवाले मेधावी (जरणाम्-उपेयुषः) जरा अवस्था को प्राप्त हुए जीर्ण मनुष्य का (पुनः-युवत्-वयः-अकृणुतम्) पुनः युवावस्थावाला जीवन करो (युवम्) तुम दोनों (वन्दनम्-ऋश्यदात्) उपासक जन का पीड़ाप्रद रोग से (उत्-ऊपथुः) उद्धार करो (युवं विश्पलां सद्यः-एतवे कृथः) प्रजा से विपरीत हुई सभा या प्रजापालिका को शीघ्र ही उनके योग्य कार्य करनेवाली बनाओ ॥८॥

भावार्थ : अध्यापक और उपदेशक ज्ञानोपार्जित करनेवाले जराप्राप्त मेधावी को अपने अमृतमय उपदेश से पुनः युवकसदृश बना देते हैं। उपासक जन को तो अनेक मानसिक पीड़ाप्रद रोगों से ऊपर उठा देते हैं तथा प्रजा से विपरीत हुई प्रजापालिका या राजसभा को भी अनुकूल कर देते हैं ॥८॥