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Rigveda / 10 / 42 / 5

धनं॒ न स्य॒न्द्रं ब॑हु॒लं यो अ॑स्मै ती॒व्रान्त्सोमाँ॑ आसु॒नोति॒ प्रय॑स्वान् । तस्मै॒ शत्रू॑न्त्सु॒तुका॑न्प्रा॒तरह्नो॒ नि स्वष्ट्रा॑न्यु॒वति॒ हन्ति॑ वृ॒त्रम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 42 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कृष्णः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : धन॑म् । न । स्प॒न्द्रम् । ब॒हु॒लम् । यः । अ॒स्मै॒ । ती॒व्रान् । सोमा॑न् । आ॒ऽसु॒नोति॑ । प्रय॑स्वान् । तस्मै॑ । शत्रू॑न् । सु॒ऽतुका॑न् । प्रा॒तः । अह्नः॑ । नि । सु॒ऽअष्ट्रा॑न् । यु॒वति॑ । हन्ति॑ । वृ॒त्रम् ॥ १०.४२.५

पदार्थ : (यः प्रयस्वान्) जो योगाभ्यास आदि प्रयत्न करनेवाला है, वह (अस्मै) इस परमात्मा के लिए (स्पन्द्रं बहुलं धनं न) स्पन्दनशील अर्थात धेर्य से सुख देनेवाले धन की भाँति (तीव्रान् सोमान्-आसुनोति) तीव्र संवेग से किये हुए उपासनारसों को सम्पादित करता है (तस्मै) उस उपासक के लिए (सुतुकान् स्वष्ट्रान् शत्रून्) बहुहिंसक सुव्याप्त कामादि शत्रुओं को (अह्नः प्रातः) दिन के प्रथम अवसर पर (नि युवति) निवारित करता है-हटाता है (वृत्रं हन्ति) आवरक अज्ञान को नष्ट करता है ॥५॥

भावार्थ : योगाभ्यास करनेवाले कामादि शत्रुओं को नष्ट करने में समर्थ होते हैं तथा बुद्धि के आवरक अज्ञान को हटाकर ज्ञानप्रकाश को उन्नत करके परमात्मा के आनन्द को भी प्राप्त करते हैं ॥५॥