Rigveda / 10 / 44 / 5
गम॑न्न॒स्मे वसू॒न्या हि शंसि॑षं स्वा॒शिषं॒ भर॒मा या॑हि सो॒मिन॑: । त्वमी॑शिषे॒ सास्मिन्ना स॑त्सि ब॒र्हिष्य॑नाधृ॒ष्या तव॒ पात्रा॑णि॒ धर्म॑णा ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 44 | Mantra No : 5
In English:
Seer : kRRiShNaH | Devta : indra: | Metre : paadanichRRijjgatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : gamannasme vasuunyaa hi sha.msiSha.m svaashiSha.m bharamaa yaahi sominaH . tvamiishiShe saasminnaa satsi barhiShyanaadhRRiShyaa tava paatraaNi dharmaNaa .
Component Words : gaman . asme iti . vasuuni . aa . hi . sha.msiSham . su.aaashiSham . bharam . aa . yaahi . sominaH . tvam . iishiShe . saH . asmin . aa . satsi . barhiShi . anaadhRRiShyaa . tava . paatraaNi . dharmaNaa . 10.44.5
In Hindi:
ऋषि : कृष्णः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : गम॑न् । अ॒स्मे इति॑ । वसू॑नि । आ । हि । शंसि॑षम् । सु॒ऽआ॒शिष॑म् । भर॑म् । आ । या॒हि॒ । सो॒मिनः॑ । त्वम् । ई॒शि॒षे॒ । सः । अ॒स्मिन् । आ । स॒त्सि॒ । ब॒र्हिषि॑ । अ॒ना॒धृ॒ष्या । तव॑ । पात्रा॑णि । धर्म॑णा ॥ १०.४४.५
पदार्थ : (अस्मे वसूनि हि-आगमन्) हमारे लिए वासयोग्य धन अवश्य प्राप्त हो, अतः (सु आशिषं शंसिषम्) शोभन प्रार्थनावचनों से प्रशंसा करता हूँ (सोमिनः-भरम्-आ याहि) उपासना-रससमर्पी अथवा उपहार समर्पण करनेवाले जिसमें अध्यात्मभाव को भरते हैं, उस हृदय में प्राप्त हो अथवा ऐश्वर्य-धनसम्पत्ति से भरपूर राष्ट्रपद पर प्राप्त हो (सः-अस्मिन् बर्हिषि-आ सत्सि) वह तू इस हृदयाकाश-हृदयासन में या राजपद पर विराजमान हो (तव पात्राणि-अनाधृष्या) हम तेरे श्रद्धावान्, पात्रभूत, स्तोता, प्रशंसक या प्रजाजन तेरे सहारे में स्थित हुए, किसी से भी पीड़ित या विचलित नहीं किये जा सकते हैं ॥५॥
भावार्थ : परमात्मा की उपासना करनेवालों के समीप आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं और परमात्मा भी उनके हृदय में साक्षात् हो जाता है। कोई बाधक कामादि दोष परमात्मा से उन्हें विचलित नहीं कर सकता है एवं प्रजाजन जब राजा के शासन के अनुकूल चलते हैं, तो सुखसाधन वस्तुएँ उन्हें सुगमतया प्राप्त हो जाती हैं। उनके मध्य में राजा राजपद पर विराजमान होकर उनकी पूरी रक्षा करता है। राजा के रक्षण से उन्हें कोई हटा नहीं सकता ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : कृष्णः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः
पदपाठ : गम॑न् । अ॒स्मे इति॑ । वसू॑नि । आ । हि । शंसि॑षम् । सु॒ऽआ॒शिष॑म् । भर॑म् । आ । या॒हि॒ । सो॒मिनः॑ । त्वम् । ई॒शि॒षे॒ । सः । अ॒स्मिन् । आ । स॒त्सि॒ । ब॒र्हिषि॑ । अ॒ना॒धृ॒ष्या । तव॑ । पात्रा॑णि । धर्म॑णा ॥ १०.४४.५
भावार्थ :