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Rigveda / 10 / 46 / 5

प्र भू॒र्जय॑न्तं म॒हां वि॑पो॒धां मू॒रा अमू॑रं पु॒रां द॒र्माण॑म् । नय॑न्तो॒ गर्भं॑ व॒नां धियं॑ धु॒र्हिरि॑श्मश्रुं॒ नार्वा॑णं॒ धन॑र्चम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 46 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वत्सप्रिः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडार्चीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : प्र । भूः॒ । जय॑न्तम् । म॒हान् । वि॒पः॒ऽधाम् । मू॒राः । अमू॑रम् । पु॒राम् । द॒र्माण॑म् । नय॑न्तः । गर्भ॑म् । व॒नाम् । धिय॑म् । धुः॒ । हिरि॑ऽश्मश्रुम् । न । अर्वा॑णम् । धन॑ऽअर्चम् ॥ १०.४६.५

पदार्थ : (जयन्तम्) जड़-चेतन को स्वाधीन करते हुए (महाम्) महान् (विपोधाम्) मेधावी स्तुतिकर्त्ताओं के धारण करनेवाले (पुरां दर्माणम्) मानसिक वासनाओं के नष्ट करनेवाले (अमूरम्) सदा सावधान-सर्वज्ञ (गर्भम्) स्तुति करने योग्य परमात्मा को (नयन्तः) अपने अन्दर प्राप्त करते हुए (मूढाः) अल्पज्ञ मनुष्य भी (प्र भूः) समर्थ हो जाते हैं-कुशल हो जाते हैं (वनाम्) वननीय (हिरिश्मश्रुम्) हिरण्यश्मश्रु जैसे तेजस्वी (अर्वाणं न) व्याप्त गतिमान् घोड़े की भाँति (धनर्चम्) प्रसन्न करनेवाली अर्चा-स्तुति जिसके लिए की जाये, ऐसे परमात्मा के प्रति (धियं धुः) बुद्धि-आस्तिकता को मनुष्य धारण करें ॥५॥

भावार्थ : परमात्मा समस्त जड़-चेतन को अपने अधिकार में रखे हुए है। वह अपने उपासकों की वासनाओं को नष्ट करता है। अल्पज्ञानी मनुष्य उसकी उपासना से कुशल बन जाते हैं। उस तेजस्वी परमात्मा की यथार्थ अर्चना और उसके प्रति आस्तिक बुद्धि मनुष्यों को रखनी चाहिए ॥५॥