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Rigveda / 10 / 49 / 5

अ॒हं र॑न्धयं॒ मृग॑यं श्रु॒तर्व॑णे॒ यन्माजि॑हीत व॒युना॑ च॒नानु॒षक् । अ॒हं वे॒शं न॒म्रमा॒यवे॑ऽकरम॒हं सव्या॑य॒ पड्गृ॑भिमरन्धयम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 49 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒हम् । र॒ध॒य॒म् । मृग॑यम् । श्रु॒तर्व॑णे । यत् । मा॒ । अजि॑हीत । व॒युना॑ । च॒न । आ॒नु॒षक् । अ॒हम् । वे॒शम् । न॒म्रम् । आ॒यवे॑ । अ॒क॒र॒म् । अ॒हम् । सव्या॑य । पट्ऽगृ॑भिम् । अ॒र॒न्ध॒य॒म् ॥ १०.४९.५

पदार्थ : (श्रुतर्वणे) मेरे सम्बन्ध में श्रवण, शिक्षण को सेवन करनेवाले के लिए (मृगयम्) मृग के प्रति जानेवाले व्याध की भाँति कामदोष को (अहं रन्धयम्) मैं परमात्मा नष्ट करता हूँ (यत्-मा-अजिहीत) यतः वह मुझे प्राप्त होता है (वयुना चन-आनुषक्) प्रज्ञान से अनुषक्त होवे-युक्त होवे-भरपूर होवे (अहम्) मैं परमात्मा (आयवे वेशं नम्रम्-अकरम्) उस मेरे समीप आनेवाले के लिए उसके अन्दर प्रविष्ट वासनादोष को मैं शिथिल करता हूँ (सव्याय पड्गृभिम्-अरन्धयम्) अध्यात्मैश्वर्य के जो योग्य है, उसके लिए बाधक जो आत्मस्वरूप को पकड़ता है, ऐसे संसार के राग या मोह को नष्ट करता हूँ ॥५॥

भावार्थ : परमात्मा का श्रवण करनेवाले का कामदोष नष्ट हो जाता है और जो उसे प्राप्त करता है, वह प्रज्ञान से युक्त हो जाता है तथा परमात्मा की ओर चलनेवाले के अन्दर का वासनादोष शिथिल हो जाता है। अध्यात्मैश्वर्य को चाहनेवाले का राग और मोह भी नष्ट हो जाता है ॥५॥