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Rigveda / 10 / 49 / 7

अ॒हं सूर्य॑स्य॒ परि॑ याम्या॒शुभि॒: प्रैत॒शेभि॒र्वह॑मान॒ ओज॑सा । यन्मा॑ सा॒वो मनु॑ष॒ आह॑ नि॒र्णिज॒ ऋध॑क्कृषे॒ दासं॒ कृत्व्यं॒ हथै॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 49 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : स्वराडार्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒हम् । सूर्य॑स्य । परि॑ । या॒मि॒ । आ॒शुऽभिः । प्र । ए॒त॒शेभिः । वह॑मानः । ओज॑सा । यत् । मा॒ । सा॒वः । मनु॑षः । आह॑ । निः॒ऽनिजे॑ । ऋध॑क् । कृ॒षे॒ । दासम् । कृत्व्य॑म् । हथैः॑ ॥ १०.४९.७

पदार्थ : (यत्-सावः-मनुषः-निर्णिजे मा-आह) जब उपासनारस का सम्पादन करनेवाला उपासक मनुष्यस्वरूप के सम्पादन के लिए मुझे कहता-प्रार्थना करता है (सूर्यस्य-आशुभिः-एतशेभिः) सूर्य की शीघ्रगामी किरणरूप अश्वों के द्वारा, जैसे सूर्य अपनी किरणों के द्वारा सर्वत्र गतिमान् होता है, वैसे (अहम्-ओजसा वहमानः परि यामि) मैं परमात्मा अपने ओजोबल से सब जगत् को वहन करता हुआ सर्वत्र प्राप्त होता हूँ, अतः (कृत्व्यं दासं हथैः-ऋधक्-कृषे) छेदनीय, क्षयकर्ता-उपासक के स्वरूप का नाशकर्ता अज्ञान या पाप को अपने हननसाधनों-ज्ञानप्रकाशों से मैं पृथक् करता हूँ ॥७॥

भावार्थ : उपासना करनेवाला आत्मा अपने स्वरूप को प्राप्त करने के लिए परमात्मा की उपासना करता है, तो वह जगत् का वहनकर्ता-संचालक परमात्मा अपने बल से सर्वत्र प्राप्त होता हुआ उपासक के नष्ट करनेवाले अज्ञान या पाप को अपने प्रकाशों से नष्ट करता है ॥७॥