Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 49 / 10

अ॒हं तदा॑सु धारयं॒ यदा॑सु॒ न दे॒वश्च॒न त्वष्टाधा॑रय॒द्रुश॑त् । स्पा॒र्हं गवा॒मूध॑स्सु व॒क्षणा॒स्वा मधो॒र्मधु॒ श्वात्र्यं॒ सोम॑मा॒शिर॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 49 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒हम् । तत् । आ॒सु॒ । धा॒र॒य॒म् । यत् । आ॒सु॒ । न । दे॒वः । च॒न । त्वष्टा॑ । अधा॑रयत् । रुश॑त् । स्पा॒र्हम् । गवा॑म् । ऊधः॑ऽसु । व॒क्षणा॑सु । आ । मधोः॑ । मधु॑ । श्वात्र्य॑म् । सोम॑म् । आ॒ऽशिर॑म् ॥ १०.४९.१०

पदार्थ : (अहम्) मैं परमात्मा (आसु तत्-धारयम्) इन गौओं में या नाड़ियों में वह दूध वा रस धारण कराता हूँ (यत्-रुशत्-आसु देवः-चन त्वष्टा न-अधारयत्) जो उज्ज्वलरूप इन गौओं में या नाड़ियों में दुग्ध या रस कोई विद्वान् या शिल्पी नहीं धारण करा सकता (गवाम्-ऊधःसु वक्षणासु स्पार्हम्) गौओं के दुग्धाधार-लेवा स्थानों में या रसवहन करने में समर्थ नाड़ियों में (आ मधोः-मधु श्वात्र्यं सोमम्-आशिरम्) जब तक मधुर से मधुर जो रुचिकर कल्याणकर है, सोम का आश्रयीभूत-सोम में मिलाने योग्य दूध को, सोमौषधि को उत्पन्न करनेवाले जल को मैं धारण करता हूँ ॥१०॥

भावार्थ : गौओं में दूध और नाड़ियों में रस मनुष्य के निर्वाह के वास्ते परमात्मा ही उत्पन्न करता है-धारण करता है। ये कार्य किसी देव अग्नि आदि का काम नहीं, न किसी शिल्पी का ॥१०॥