Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 59 / 6

असु॑नीते॒ पुन॑र॒स्मासु॒ चक्षु॒: पुन॑: प्रा॒णमि॒ह नो॑ धेहि॒ भोग॑म् । ज्योक्प॑श्येम॒ सूर्य॑मु॒च्चर॑न्त॒मनु॑मते मृ॒ळया॑ नः स्व॒स्ति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 59 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : बन्ध्वादयो गौपायनाः | देवता : असुनीतिः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : असु॑ऽनीते । पुनः॑ । अ॒स्मासु॑ । चक्षुः॑ । पुन॒रिति॑ । प्रा॒णम् । इ॒ह । नः॒ । धे॒हि॒ । भोग॑म् । ज्योक् । प॒श्ये॒म॒ । सूर्य॑म् । उ॒त्ऽचर॑न्तम् । अनु॑ऽमते । मृ॒ळय॑ । नः॒ । स्व॒स्ति ॥ १०.५९.६

पदार्थ : (असुनीते) हे प्राणों को प्राप्त करानेवाले परमात्मन् ! (पुनः-इह अस्मासु चक्षुः-प्राणं भोगं नः-धेहि) तू इस जीवन में-इस पुनर्जन्म में हमारे निमित्त पुनः नेत्र, पुनः प्राण और भोग पदार्थ को धारण करा (सूर्यम्-उच्चरन्तं ज्योक् पश्येम) उदय होते हुए सूर्य को चिरकाल तक देखें (अनुमते नः स्वस्ति मृळय) हे आज्ञापक परमेश्वर ! हमारे लिए कल्याण जैसे हो, ऐसे सुखी कर ॥६॥

भावार्थ : पुनर्जन्म में प्राण नेत्र आदि अङ्ग पूर्वजन्म के समान परमात्मा देता है। वह हमारे जीवन को सुखी बनाने के लिए सब साधन भोगपदार्थ देता है, उसका हमें कृतज्ञ होना चाहिए तथा उपासना करनी चाहिए ॥६॥