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Rigveda / 10 / 59 / 10

समि॑न्द्रेरय॒ गाम॑न॒ड्वाहं॒ य आव॑हदुशी॒नरा॑ण्या॒ अन॑: । भर॑ता॒मप॒ यद्रपो॒ द्यौः पृ॑थिवि क्ष॒मा रपो॒ मो षु ते॒ किं च॒नाम॑मत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 59 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : बन्ध्वादयो गौपायनाः | देवता : द्यावापृथिव्यौ, द्यावापृथिव्याविन्द्रश्च | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : सम् । इ॒न्द्र॒ । ई॒र॒य॒ । गाम् । अ॒न॒ड्वाह॑म् । यः । आ । स्व॑हत् । उ॒शी॒नरा॑ण्याः । अनः॑ । भर॑ताम् । अप॑ । यत् । रपः॑ । द्यौः । पृ॒थि॒वि॒ । क्ष॒मा । रपः॑ । मो इति॑ । सु । ते॒ । किम् । च॒न । आ॒म॒म॒त् ॥ १०.५९.१०

पदार्थ : (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् ! परमात्मन् ! या सूर्य ! (अनड्वाहं गाम्-सम्-ईरय) अनत्-अनड्-प्राणत्, प्राण लेते हुए शरीर को या शरीररूप शकट को जो वहन करता है-चलाता है, उस गमनशील को सम्यक् प्रेरित कर (यः-उशीनराण्याः-अनः-आ अवहत्) जो कामना-वाञ्छा करने में कुशल हैं, वे उशीनर, उशीनर सम्बन्धी भोगसृष्टि उसका जो शरीररूप शकट है, उसे चलानेवाला प्राण उसे चलाता है (भरताम्-अप……) इति पूर्ववत् ॥१०॥

भावार्थ : परमात्मा सबके शरीरों को चलानेवाले प्राण को प्रेरित करता है। प्रत्येक प्राणी भोगसृष्टि की कामना करता है। यदि कोई प्राणी असावधानता से भोगसृष्टि में पड़ता है, तो वह रोगी और दुःखी हो जाता है और अपनी सन्तान को भी दुःखी बनाता है। अतः सावधानी से भोगसृष्टि में विचरे ॥१०॥