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Rigveda / 10 / 60 / 10

य॒माद॒हं वै॑वस्व॒तात्सु॒बन्धो॒र्मन॒ आभ॑रम् । जी॒वात॑वे॒ न मृ॒त्यवेऽथो॑ अरि॒ष्टता॑तये ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 60 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : बन्ध्वादयो गौपायनाः | देवता : सुबन्धोर्जीविताह्वानम् | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : य॒मात् । अ॒हम् । वै॒व॒स्व॒तात् । सु॒ऽबन्धोः॑ । मनः॑ । आ । अ॒भ॒र॒म् । जी॒वात॑वे । न । मृ॒त्यवे॑ । अथो॒ इति॑ । अ॒रि॒ष्टऽता॑तये ॥ १०.६०.१०

पदार्थ : (अहम् वैवस्वतात्-यमात्) मैं चिकित्सक सूर्य के पुत्र मारक काल से (सुबन्धोः-मनः-जीवातवे-आभरम्) सुष्ठु बाँधनेवाले कुमार के मन को जीने के लिए ले आया हूँ (न मृत्यवे) मृत्यु के लिए नहीं अर्थात् मृत्यु के कारण को दूर कर दिया है (अथ-उ) और (अरिष्टतातये) कल्याण के लिए ॥१०॥

भावार्थ : योग्य चिकित्सक को चाहिए कि सुकुमार बालक के मन से मृत्यु के भय को दूर करे और उसे आश्वासन दे कि मैंने मृत्यु के कारण को दूर कर दिया है, तुझे जीवनधारण करने के लिए समर्थ बना दिया है ॥१०॥