Rigveda / 10 / 61 / 5
प्रथि॑ष्ट॒ यस्य॑ वी॒रक॑र्ममि॒ष्णदनु॑ष्ठितं॒ नु नर्यो॒ अपौ॑हत् । पुन॒स्तदा वृ॑हति॒ यत्क॒नाया॑ दुहि॒तुरा अनु॑भृतमन॒र्वा ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 61 | Mantra No : 5
In English:
Seer : naabhaanediShTho maanavaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : prathiShTa yasya viirakarmamiShNadanuShThita.m nu naryo apauhat . punastadaa vRRihati yatkanaayaa duhituraa anubhRRitamanarvaa .
Component Words : prathiShTa . yasya . viira.akarmam . iShNat . anu.asthitam . nu . naryaH . apa . auhat . punariti . tat . aa . vRRihati . yat . kanaayaaH . duhituH . aaH . anu.abhRRitam . anarvaa . 10.61.5
In Hindi:
ऋषि : नाभानेदिष्ठो मानवः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : प्रथि॑ष्ट । यस्य॑ । वी॒रऽक॑र्मम् । इ॒ष्णत् । अनु॑ऽस्थितम् । नु । नर्यः॑ । अप॑ । औ॒ह॒त् । पुन॒रिति॑ । तत् । आ । वृ॒ह॒ति॒ । यत् । क॒नायाः॑ । दु॒हि॒तुः । आः । अनु॑ऽभृतम् । अ॒न॒र्वा ॥ १०.६१.५
पदार्थ : (यस्य वीरकर्मम्-प्रथिष्ट) जिस गृहस्थ का पुत्रकर्म-पुत्रोत्पादनार्थ कर्म वीर्यसेचन प्रथित-पुष्ट होता है (इष्णत्-अनुष्ठितम्) पुत्ररूप से प्राप्त सफलीभूत को (पुनः-तत् आवृहति) फिर उसको वह भलीभाँति उत्साहित करता है पुत्रोत्पादन द्वारा (नु नर्यः-अपौहत्) नरों का अवश्य हितकर होता हुआ सब कार्यभार को त्याग दे (यत्) जिससे कि (कनायाः दुहितुः-अनुभृतम्-आस्) सन्तान दोहन योग्य-उत्पादन योग्य कान्ता की अनुकूलता में धारण किया है (अनर्वा) अपने में समर्थ स्वाश्रयवाला हो जाता है ॥५॥
भावार्थ : गृहस्थ का लक्ष्य सन्तान उत्पादन करना है, तदर्थ वीर्यसेचन करने पर कमनीय सन्तान को दोहनेवाली पत्नी में वह पुष्ट होकर सन्तान के रूप में उत्पन्न हो जाता है और वह युवा बन जाता है। तब पिता उसे पुत्र परम्परा चलाने के लिए उत्साहित करता है। जब वह पुत्र पुत्रवान् बन जाता है, तो फिर उसका पिता गृहस्थ को त्याग दे अन्य मनुष्यों के हितकार्य करने के लिए ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : नाभानेदिष्ठो मानवः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : प्रथि॑ष्ट । यस्य॑ । वी॒रऽक॑र्मम् । इ॒ष्णत् । अनु॑ऽस्थितम् । नु । नर्यः॑ । अप॑ । औ॒ह॒त् । पुन॒रिति॑ । तत् । आ । वृ॒ह॒ति॒ । यत् । क॒नायाः॑ । दु॒हि॒तुः । आः । अनु॑ऽभृतम् । अ॒न॒र्वा ॥ १०.६१.५
भावार्थ :