Rigveda / 10 / 61 / 10
म॒क्षू क॒नाया॑: स॒ख्यं नव॑ग्वा ऋ॒तं वद॑न्त ऋ॒तयु॑क्तिमग्मन् । द्वि॒बर्ह॑सो॒ य उप॑ गो॒पमागु॑रदक्षि॒णासो॒ अच्यु॑ता दुदुक्षन् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 61 | Mantra No : 10
In English:
Seer : naabhaanediShTho maanavaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : makShuu kanaayaaH sakhya.m navagvaa RRIta.m vadanta RRItayuktimagman . dvibarhaso ya upa gopamaaguradakShiNaaso achyutaa dudukShan .
Component Words : makShu . kanaayaaH . sakhyam . nava.agvaaH . RRItam . vadantaH . RRIta.ayuktim . agman . dvi.abarhasaH . ye . upa . gopam . aa . aguH . adakShiNaasaH . achyutaa . dudukShan . 10.61.10
In Hindi:
ऋषि : नाभानेदिष्ठो मानवः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : म॒क्षु । क॒नायाः॑ । स॒ख्यम् । नव॑ऽग्वाः । ऋ॒तम् । वद॑न्तः । ऋ॒तऽयु॑क्तिम् । अ॒ग्म॒न् । द्वि॒ऽबर्ह॑सः । ये । उप॑ । गो॒पम् । आ । अगुः॑ । अ॒द॒क्षि॒णासः॑ । अच्यु॑ता । दु॒दु॒क्ष॒न् ॥ १०.६१.१०
पदार्थ : (नवग्वाः) नवीन शिक्षित स्नातक (ऋतं वदन्तः) वेदज्ञान या सत्य प्रतिज्ञावचन कहते हुए या उसके अनुसार आचरण करते हुए (कन्यायाः सख्यम्) कन्या के सखित्व-पत्नीसम्बन्ध को (मधु-ऋतयुक्तिम्-अग्मन्) तुरन्त स्वार्थ को अनपेक्षित करके विवाहसंस्कार-यज्ञप्रक्रिया के अनुसार प्राप्त करते हैं (द्विबर्हसः) वे दोनों अर्थात् पिता और श्वसुर के घरों को बढ़ानेवाले (ये गोपम्-उप-आ-अगुः) जो इन्द्रिय-रक्षण को-जितेन्द्रियता को प्राप्त होते हैं (अदक्षिणासः) बाह्यधन की अपेक्षा न करते हुए (अच्युता दुधुक्षन्) स्थिर फलों को दोहते पाते हैं ॥१०॥
भावार्थ : नव स्नातक यज्ञवेदि पर विवाहसंस्कार में वधू की कामना करते हुए वेदमन्त्रों का उच्चारण तथा तदनुसार प्रतिज्ञा करते हुए योग्य कुमारी से विवाह करें। दोनों कुलों अर्थात् पितृ-कुल और श्वसुरकुल की कल्याणवृद्धि चाहते हुए स्वयं श्वसुरकुल से धन की कामना-दहेज-प्रप्ति की इच्छा न करते हुए गृहस्थ के स्थिर सुखों को प्राप्त करें ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : नाभानेदिष्ठो मानवः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : म॒क्षु । क॒नायाः॑ । स॒ख्यम् । नव॑ऽग्वाः । ऋ॒तम् । वद॑न्तः । ऋ॒तऽयु॑क्तिम् । अ॒ग्म॒न् । द्वि॒ऽबर्ह॑सः । ये । उप॑ । गो॒पम् । आ । अगुः॑ । अ॒द॒क्षि॒णासः॑ । अच्यु॑ता । दु॒दु॒क्ष॒न् ॥ १०.६१.१०
भावार्थ :