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Rigveda / 10 / 63 / 2

विश्वा॒ हि वो॑ नम॒स्या॑नि॒ वन्द्या॒ नामा॑नि देवा उ॒त य॒ज्ञिया॑नि वः । ये स्थ जा॒ता अदि॑तेर॒द्भ्यस्परि॒ ये पृ॑थि॒व्यास्ते म॑ इ॒ह श्रु॑ता॒ हव॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 63 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : विश्वा॑ । हि । वः॒ । न॒म॒स्या॑नि । वन्द्या॑ । नामा॑नि । दे॒वाः॒ । उ॒त । य॒ज्ञिया॑नि । वः॒ । ये । स्थ । जा॒ताः । अदि॑तेः । अ॒त्ऽभ्यः । परि॑ । ये । पृ॒थि॒व्याः । ते । मे॒ । इ॒ह । श्रु॒त॒ । हव॑म् ॥ १०.६३.२

पदार्थ : (देवाः) हे विद्वानों ! (वः) तुम्हारे (विश्वा हि) सारे ही (नामानि) प्रसिद्ध कर्म (नमस्यानि वन्द्या) सत्करणीय सेवनीय तथा कमनीय (उत) और (वः) तुम्हारे वे (यज्ञियानि) अध्यात्मयज्ञ के साधन कर्म उपासना ज्ञान सम्पादक हैं (ये जाताः स्थ) जो तुम प्रसिद्ध हो (अदितेः परि) द्युलोकज्ञान में निष्णात (अद्भ्यः परि) अन्तरिक्षज्ञान में निष्णात (ते) वे तुम (इह) इस ज्ञानप्रदान स्थान में (मे हवं श्रुतं) मेरे ज्ञानप्रदानार्थ प्रार्थनावचन को सुनो-स्वीकार करो ॥२॥

भावार्थ : विद्वान् जन द्युलोक में ज्ञाननिष्णात, अन्तरिक्षज्ञान में निष्णात तथा पृथिवी के ज्ञान में निष्णात होकर श्रेष्ठ कमनीय कर्म करते हैं, उनसे ज्ञानग्रहण और सत्सङ्गलाभ लेना चाहिए ॥२॥