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Rigveda / 10 / 64 / 8

त्रिः स॒प्त स॒स्रा न॒द्यो॑ म॒हीर॒पो वन॒स्पती॒न्पर्व॑ताँ अ॒ग्निमू॒तये॑ । कृ॒शानु॒मस्तॄ॑न्ति॒ष्यं॑ स॒धस्थ॒ आ रु॒द्रं रु॒द्रेषु॑ रु॒द्रियं॑ हवामहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 64 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : त्रिः । स॒प्त । स॒स्राः । न॒द्यः॑ । म॒हीः । अ॒पः । वन॒स्पती॒न् । पर्व॑तान् । अ॒ग्निम् । ऊ॒तये॑ । कृ॒शानु॑म् । अस्तॄ॑न् । ति॒ष्य॑म् । स॒धऽस्थे॑ । आ । रु॒द्रम् । रु॒द्रेषु॑ । रु॒द्रिय॑म् । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ १०.६४.८

पदार्थ : (त्रिः सप्त) तीन लोकों में सात रश्मियों (सस्राः-नद्यः) बहती हुई नदियों (महीः-अपः) बहुतेरी जलधाराओं (वनस्पतीन्) ओषधि वनस्पतियों (पर्वतान्) पर्वतों (अग्निम्) अग्नि को (ऊतये) रक्षा के लिए (कृशानुम्) विद्युत् को (अस्तॄन्) मेघों को फेंकनेवाली हवाओं को (तिष्यम्) सूर्य को (रुद्रेषु रुद्रियं रुद्रम्) अग्नियों में होमवाली अग्नि को (सधस्थं-आ हवामहे) अपने समानस्थान में सम्मलेन में होमयज्ञ में भलीप्रकार प्रयोग करते हैं ॥८॥

भावार्थ : तीनों लोकों में फैली हुई सूर्य की रश्मियों तथा नदी और जलधाराओं, पर्वतों, विद्युत्, अग्नि, सूर्य मेघक्षेपक हवाओं का उपयोग विशेष विज्ञान तथा होम के द्वारा लेना चाहिए ॥८॥