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Rigveda / 10 / 64 / 10

उ॒त मा॒ता बृ॑हद्दि॒वा शृ॑णोतु न॒स्त्वष्टा॑ दे॒वेभि॒र्जनि॑भिः पि॒ता वच॑: । ऋ॒भु॒क्षा वाजो॒ रथ॒स्पति॒र्भगो॑ र॒ण्वः शंस॑: शशमा॒नस्य॑ पातु नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 64 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : उ॒त । मा॒ता । बृ॒ह॒त्ऽदि॒वा । शृ॒णो॒तु॒ । नः॒ । त्वष्टा॑ । दे॒वेभिः॑ । जनि॑ऽभिः । पिता॑ । वचः॑ । ऋ॒भु॒क्षाः । वाजः॑ । रथः॒ऽपतिः॑ । भगः॑ । र॒ण्वः । शंसः॑ । श॒श॒मा॒नस्य॑ । पा॒तु॒ । नः॒ ॥ १०.६४.१०

पदार्थ : (उत) और (बृहद्दिवा) महती दीप्तिवाला (जनिभिः) अपनी उत्पादन शक्तियों द्वारा (माता) जगत् का निर्माणकर्त्ता (त्वष्टा पिता) कर्मानुरूप शरीररचयिता पिता परमात्मा (नः-वचः शृणोतु) हमारे प्रार्थनावचन को सुने-स्वीकार करे (ऋभुक्षाः) ऋभुओं-मेधावी जनों को बसानेवाला (वाजः) बलवान् (रथस्पतिः) रमणीय मोक्ष का स्वामी-मोक्षदाता (भगः) भजनीय (रण्वः) रमणीय (शशमानस्य शंसः) प्रशंसमान-स्तुति करनेवाले का स्तुति करने योग्य (नः पातु) हमारी रक्षा करे ॥१०॥

भावार्थ : परमात्मा अपनी उत्पादनशक्तियों द्वारा जगत् की माता और पिता है। वह कर्मानुसार शरीर का निर्माण करता है। मेधावी जनों को बसाने वाला, स्तुति करनेवालों का स्तुतियोग्य मोक्षदाता है ॥१०॥