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Rigveda / 10 / 64 / 16

ए॒वा क॒विस्तु॑वी॒रवाँ॑ ऋत॒ज्ञा द्र॑विण॒स्युर्द्रवि॑णसश्चका॒नः । उ॒क्थेभि॒रत्र॑ म॒तिभि॑श्च॒ विप्रोऽपी॑पय॒द्गयो॑ दि॒व्यानि॒ जन्म॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 64 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒व । क॒विः । तु॒वि॒ऽरवा॑न् । ऋ॒त॒ऽज्ञाः । द्र॒वि॒ण॒स्युः । द्रवि॑णसः । च॒का॒नः । उ॒क्थेभिः॑ । अत्र॑ । म॒तिऽभिः॑ । च॒ । विप्रः॑ । अपी॑पयत् । गयः॑ । दि॒व्यानि॑ । जन्म॑ ॥ १०.६४.१६

पदार्थ : (एव) इस प्रकार (कविः) मेधावी (तुवीरवान्) बहुत ज्ञान ऐश्वर्य्यवाला (ऋतज्ञाः) सत्य तत्त्व का जाननेवाला (द्रविणस्युः) मोक्ष धन का इच्छुक (द्रविणसः-चकानः) विविध धन की कामना करनेवाला (अत्र-उक्थेभिः-च मतिभिः) इस जन्म में स्तुतियों तथा मन्त्रवचनों के द्वारा (विप्रः) अपने को विशेषरूप से तृप्त करनेवाला (गयः-दिव्यानि जन्म-अपीपयत्) प्राणवान् होता हुआ मोक्षविषयक सुखमय स्थानों को बढ़ाता है ॥१६॥

भावार्थ : मेधावी विद्वान् ज्ञान ऐश्वर्य से सम्पन्न होकर संसार में विविध सम्पत्ति को चाहता हुआ उपार्जित तथा प्राप्त करता है। उससे अपने को तृप्त करता हुआ योग्य आचरणवाला होकर मोक्षसुखों का अधिकारी बनता है ॥१६॥