Rigveda / 10 / 65 / 4
स्व॑र्णरम॒न्तरि॑क्षाणि रोच॒ना द्यावा॒भूमी॑ पृथि॒वीं स्क॑म्भु॒रोज॑सा । पृ॒क्षा इ॑व म॒हय॑न्तः सुरा॒तयो॑ दे॒वाः स्त॑वन्ते॒ मनु॑षाय सू॒रय॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 65 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vasukarNo vaasukraH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : svarNaramantarikShaaNi rochanaa dyaavaabhuumii pRRithivii.m skambhurojasaa . pRRikShaa iva mahayantaH suraatayo devaaH stavante manuShaaya suurayaH .
Component Words : svaH.anaram . antarikShaaNi . rochanaa . dyaavaabhuumii iti . pRRithiviim . skambhuH . ojasaa . pRRikShaaH.aiva . mahayantaH . su.araatayaH . devaaH . stavante . manuShaaya . suurayaH . 10.65.4
In Hindi:
ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : स्वः॑ऽनरम् । अ॒न्तरि॑क्षाणि । रो॒च॒ना । द्यावा॒भूमी॒ इति॑ । पृ॒थि॒वीम् । स्क॒म्भुः॒ । ओज॑सा । पृ॒क्षाःऽइ॑व । म॒हय॑न्तः । सु॒ऽरा॒तयः॑ । दे॒वाः । स्त॒व॒न्ते॒ । मनु॑षाय । सू॒रयः॑ ॥ १०.६५.४
पदार्थ : (स्वर्णरम्) तेजस्वी सूर्य को (अन्तरिक्षाणि रोचना) अन्तरिक्ष में होनेवाले नक्षत्रों को (द्यावाभूमी) द्युलोक पृथिवीलोक को (पृथिवीम्) फैली हुई सृष्टि को (ओजसा) ज्ञान बल से (स्कम्भुः) अपने अन्दर धारण करते हैं-सम्भालते हैं (पृक्षाः इव) सम्पृक्त सुबन्धु के समान (महयन्तः) महत्त्व को चाहते हुए (सुरातयः) शोभन ज्ञानदाता (सूरयः-देवाः) स्तोता विद्वान् (मनुषाय) मनुष्य के लिए (स्तवन्ते) वर्णन करते हैं ॥४॥
भावार्थ : सृष्टि के महत्त्ववाले पदार्थों का स्वयं क्रियात्मक ज्ञान करके जो दूसरों को भी ज्ञान देते हैं, वे महानुभाव धन्य हैं ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : स्वः॑ऽनरम् । अ॒न्तरि॑क्षाणि । रो॒च॒ना । द्यावा॒भूमी॒ इति॑ । पृ॒थि॒वीम् । स्क॒म्भुः॒ । ओज॑सा । पृ॒क्षाःऽइ॑व । म॒हय॑न्तः । सु॒ऽरा॒तयः॑ । दे॒वाः । स्त॒व॒न्ते॒ । मनु॑षाय । सू॒रयः॑ ॥ १०.६५.४
भावार्थ :