Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 66 / 12

स्याम॑ वो॒ मन॑वो दे॒ववी॑तये॒ प्राञ्चं॑ नो य॒ज्ञं प्र ण॑यत साधु॒या । आदि॑त्या॒ रुद्रा॒ वस॑व॒: सुदा॑नव इ॒मा ब्रह्म॑ श॒स्यमा॑नानि जिन्वत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 66 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : स्याम॑ । वः॒ । मन॑वः । दे॒वऽवी॑तये । प्राञ्च॑म् । नः॒ । य॒ज्ञम् । प्र । न॒य॒त॒ । सा॒धु॒ऽया । आदी॑त्याः । रुद्राः॑ । वस॑वः । सुऽदा॑नवः । इ॒मा । ब्रह्म॑ । श॒स्यमा॑नानि । जि॒न्व॒त॒ ॥ १०.६६.१२

पदार्थ : (मनवः) हे मननशील विद्वानों ! (वः) तुम्हारी (देववीतये) विद्वत्सङ्गति के लिए (स्याम) हम हों (नः-यज्ञं प्राञ्चं साधुया प्रणयत) हमारे ज्ञानयज्ञ को प्रगतिशील साधुरूप में प्रवर्तित करो (आदित्याः-रुद्राः-वसवः सुदानवः) पूर्णब्रह्मचारी, मध्यब्रह्मचारी, अल्पब्रह्मचारी तथा शोभनज्ञान देनेवाले (इमा ब्रह्मा शस्यमानानि जिन्वत) इन मन्त्रवचनों प्रशंसनीय वचनों को प्राप्त करावें ॥१२॥

भावार्थ : विद्वानों की सङ्गति करके ज्ञान प्राप्त करना और आध्यात्मिक साधना में लगना चाहिए तथा उच्च, मध्यम और अवम ब्रह्मचारियों से उनके अधीत मन्त्रविज्ञानों का श्रवण करना चाहिए ॥१२॥