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Rigveda / 10 / 67 / 2

ऋ॒तं शंस॑न्त ऋ॒जु दीध्या॑ना दि॒वस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒राः । विप्रं॑ प॒दमङ्गि॑रसो॒ दधा॑ना य॒ज्ञस्य॒ धाम॑ प्रथ॒मं म॑नन्त ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 67 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अयास्यः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ऋ॒तम् । शंस॑न्तः । ऋ॒जु । दीध्या॑नाः । दि॒वः । पु॒त्रासः॑ । असु॑रस्य । वी॒राः । विप्र॑म् । प॒दम् । अङ्गि॑रसः । दधा॑नाः । य॒ज्ञस्य॑ । धाम॑ । प्र॒थ॒मम् । म॒न॒न्त॒ ॥ १०.६७.२

पदार्थ : (ऋतं शंसन्तः) वेदज्ञान का उपदेश करते हुए (ऋजुदीध्यानाः) सरल स्वभाववाले परमात्मा का ध्यान करते हुए (दिवः-पुत्रासः) ज्ञानप्रकाशक परमात्मा के पुत्रसमान परमऋषि (असुरस्य वीराः) प्राणप्रद परमेश्वर के ज्ञानी (अङ्गिरसः) अङ्गों के स्वाधीन प्रेरित करनेवाले संयमी (विप्रं प्रदं दधानाः) विशेषरूप से तृप्त करनेवाले प्रापणीय परमात्मा को धारण करते हुए उपासक (यज्ञस्य प्रथमं धामं मनन्त) सङ्गमनीय परमात्मा के प्रमुख धाम-स्वरूप को मानते हैं ॥२॥

भावार्थ : आदि सृष्टि में परम ऋषि वेदज्ञान का उपदेश करते हैं, वे परमात्मा के ध्यान में मग्न हुए परमात्मा के पुत्रसमान, अपनी इन्द्रियों के स्वामी-संयमी होते हैं। वे परमात्मा के स्वरूप को यथार्थरूप से जानते हैं, वैसे ही दूसरों को भी जनाते हैं ॥२॥